भारत में बायो-फार्मा और रासायनिक क्षेत्र को मजबूत करने की नई रणनीति
भारत सरकार देश के बायो-फार्मास्युटिकल और रासायनिक उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए नई रणनीति पर कार्य कर रही है। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री जे. पी. नड्डा ने “सस्टेनिंग एंड स्ट्रेंथनिंग इकोनॉमिक ग्रोथ” विषय पर आयोजित बजट के बाद के वेबिनार में बताया कि सरकार ने बायो-फार्मा शक्ति योजना के लिए 13,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसके साथ ही तीन समर्पित केमिकल पार्क स्थापित करने की योजना भी बनाई गई है। यह पहल विकसित भारत के व्यापक लक्ष्य के अनुरूप है और इसका उद्देश्य उच्च मूल्य वाले औषधि एवं रसायन निर्माण में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।
बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स की ओर बढ़ता वैश्विक रुझान
भारत लंबे समय से किफायती जेनेरिक दवाओं के बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण “विश्व की फार्मेसी” के रूप में जाना जाता है। हालांकि वैश्विक फार्मास्युटिकल उद्योग तेजी से बायोलॉजिक्स की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत दवाएं बायोलॉजिक्स श्रेणी की होंगी।
इसके अलावा वर्ष 2030 तक लगभग 300 अरब डॉलर मूल्य के पेटेंट समाप्त होने वाले हैं, जिससे बायोसिमिलर्स बाजार में नए अवसर पैदा होंगे। इन संभावनाओं का लाभ उठाने के लिए सरकार ने बायोफार्मा मिशन शुरू किया है, जिसके लिए अगले पांच वर्षों में लगभग 10,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
अनुसंधान अवसंरचना का विस्तार
देश में अनुसंधान और नवाचार को मजबूत करने के लिए सरकार लगभग 1000 क्लिनिकल ट्रायल साइट स्थापित करने की योजना बना रही है। इससे नई दवाओं के विकास, परीक्षण और नियामक अनुसंधान की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
साथ ही राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान जैसे संस्थानों को भी सुदृढ़ करने पर जोर दिया जा रहा है। इन संस्थानों को कौशल विकास और प्रतिभा निर्माण कार्यक्रमों के साथ जोड़ा जाएगा ताकि फार्मास्युटिकल क्षेत्र में विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार किया जा सके।
नियामक और औद्योगिक तंत्र को मजबूत बनाना
भारत के औषधि नियामक तंत्र को भी अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन को मजबूत किया जाएगा ताकि दवाओं की स्वीकृति प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाया जा सके।
इन सुधारों का उद्देश्य बायोसिमिलर्स और किण्वन आधारित दवा उत्पादन जैसे उभरते क्षेत्रों को प्रोत्साहित करना है। तेज अनुमोदन प्रक्रिया और बेहतर नियामक व्यवस्था से निवेश को आकर्षित करने और नवाचार को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।
केमिकल पार्क के माध्यम से विनिर्माण को बढ़ावा
सरकार ने तीन विश्वस्तरीय केमिकल पार्क विकसित करने के लिए 3,300 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इन पार्कों में प्लग-एंड-प्ले अवसंरचना, आधुनिक अपशिष्ट उपचार प्रणाली, समेकित लॉजिस्टिक्स और उन्नत सुरक्षा व्यवस्था जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
वर्तमान में भारत का रासायनिक उद्योग लगभग 19.4 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन करता है, लेकिन वैश्विक बाजार में इसकी हिस्सेदारी केवल लगभग 3 प्रतिशत है। नए केमिकल पार्क औद्योगिक सहयोग और संसाधनों के साझा उपयोग के माध्यम से उत्पादन लागत को 20 से 40 प्रतिशत तक कम करने में मदद करेंगे। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक वैश्विक रासायनिक बाजार में भारत की हिस्सेदारी 5 से 6 प्रतिशत तक बढ़ाना और वर्ष 2040 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का कारोबार हासिल करना है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- बायोसिमिलर्स ऐसी जैविक दवाएं होती हैं जो पहले से स्वीकृत बायोलॉजिकल दवाओं के समान प्रभाव और संरचना रखती हैं।
- भारत को किफायती जेनेरिक दवाओं के बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण “विश्व की फार्मेसी” कहा जाता है।
- राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान भारत में औषधि शिक्षा और अनुसंधान के लिए प्रमुख संस्थानों का नेटवर्क है।
- केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन भारत में दवाओं और चिकित्सा उपकरणों का राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण है।
भारत की यह नई रणनीति फार्मास्युटिकल और रासायनिक उद्योगों को मजबूत आधार प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अनुसंधान, विनिर्माण अवसंरचना और नियामक सुधारों के माध्यम से देश न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकेगा बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी स्थिति को और मजबूत बना सकेगा।