भारत में पहली बार मिला ब्रांट का हेजहॉग: जम्मू-कश्मीर की जैव विविधता में नई खोज
जम्मू-कश्मीर में एक नई हेजहॉग प्रजाति की खोज हुई है, जिसे भारत में पहले कभी दर्ज नहीं किया गया था। यह खोज राजौरी–पुंछ क्षेत्र में हुई और डीएनए विश्लेषण व आकारिकी अध्ययन के माध्यम से इसकी वैज्ञानिक पुष्टि की गई है। यह भारत की जैव विविधता में एक ऐतिहासिक जोड़ माना जा रहा है।
राजौरी-पुंछ क्षेत्र में पहली बार देखा गया
इस हेजहॉग को सबसे पहले 2024 में राजौरी–पुंछ क्षेत्र में जम्मू और कश्मीर वन्यजीव विभाग द्वारा देखा गया था। प्रारंभ में इसे भारतीय लंबे कान वाला हेजहॉग समझा गया, लेकिन बाद में हुए वैज्ञानिक परीक्षणों से पुष्टि हुई कि यह वास्तव में ब्रांट का हेजहॉग (Brandt’s hedgehog – Paraechinus hypomelas) है, जिसे भारत में पहले कभी दर्ज नहीं किया गया था।
वैज्ञानिक अध्ययन और पुष्टि
- डीएनए प्रोफाइलिंग और आकारिकी विश्लेषण (morphometric analysis) के माध्यम से इसकी पहचान की गई।
- यह अध्ययन जम्मू और कश्मीर वन्यजीव विभाग ने जम्मू विश्वविद्यालय और हैदराबाद स्थित उस्मानिया विश्वविद्यालय के साथ मिलकर किया।
- वन्यजीव वार्डन अमित शर्मा के नेतृत्व में टीम ने यह निष्कर्ष दिसंबर में आयोजित छठी जम्मू-कश्मीर वन्यजीव बोर्ड बैठक में प्रस्तुत किया, जिसकी अध्यक्षता उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने की।
जैव-भौगोलिक महत्व और आवास विस्तार
- ब्रांट का हेजहॉग अब तक केवल अफगानिस्तान, ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब और मध्य एशिया के कुछ भागों में पाया गया था।
- इसका जम्मू-कश्मीर में पाया जाना आवास विस्तार (range expansion) की ओर संकेत करता है, जो संभवतः जलवायु परिवर्तन, आवासीय संपर्कता और भोजन उपलब्धता जैसे कारकों से प्रभावित हो सकता है।
- यह प्रजाति मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र और वनों के बीच स्थित इकोटोन (ecotone) क्षेत्रों में पाई गई, और इसका मुख्य आहार कृंतक (rodents) हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ब्रांट का हेजहॉग (Paraechinus hypomelas) भारत में पहली बार दर्ज किया गया है।
- यह खोज राजौरी–पुंछ क्षेत्र में हुई है।
- डीएनए परीक्षण और आकारिकी विश्लेषण के जरिए प्रजाति की पुष्टि की गई है।
- इसका आवास विस्तार जलवायु परिवर्तन और आवास संपर्कता से संबंधित हो सकता है।
संरक्षण और भविष्य की योजना
- विशेषज्ञों ने इस खोज के आधार पर क्षेत्र में लक्षित संरक्षण योजना की सिफारिश की है।
- लंबी अवधि की निगरानी और आवास मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया गया है, ताकि प्रजाति की जनसंख्या गतिशीलता को समझा जा सके।
- एक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र प्रस्तुत किया गया है और इसे भारतीय प्राणी सर्वेक्षण विभाग की वार्षिक सूची में शामिल करने की प्रक्रिया जारी है।
यह खोज भारत की जैव विविधता संपदा को और भी समृद्ध करती है और द्वीपीय और पर्वतीय पारिस्थितिकीय तंत्रों के महत्व को रेखांकित करती है।
Originally written on
January 25, 2026
and last modified on
January 25, 2026.