भारत में दो नई दुर्लभ एंट फ्लाई प्रजातियों की खोज: जैव विविधता संरक्षण को नई दिशा
केरल और तमिलनाडु के शोधकर्ताओं ने भारत में दो नई और अत्यंत दुर्लभ एंट फ्लाई (Ant Fly) प्रजातियों की खोज की है। यह खोज दर्शाती है कि जैव विविधता केवल संरक्षित जंगलों में ही नहीं, बल्कि शहरी हरित क्षेत्रों में भी जीवंत बनी हुई है। एक प्रजाति दिल्ली की एक शहरी वनपट्टी में मिली, जबकि दूसरी तमिलनाडु के पश्चिमी घाटों में पाई गई। यह खोज भारत के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की व्यापकता और विविधता को रेखांकित करती है।
नई प्रजातियाँ और उनकी विशिष्ट पारिस्थितिकी
नई खोजी गई दो प्रजातियाँ हैं — Metadon ghorpadei और Metadon reemeri, जो माइक्रोडॉन्टिनी (Microdontinae) उप-परिवार से संबंधित हैं, जिसे सिरफिडी (Syrphidae) कुल के अंतर्गत रखा जाता है।
इनकी सबसे अनोखी विशेषता यह है कि इनकी लार्वा अवस्था चींटी के घोंसलों में व्यतीत होती है, जहाँ वे चींटी के अंडों और लार्वा पर निर्भर करती हैं। इस प्रकार की जीवन शैली को “मायर्मेकोफिली” (myrmecophily) कहा जाता है।
इस अत्यधिक अनुकूलित व्यवहार के कारण माइक्रोडॉन्टिनी प्रजातियाँ अत्यंत दुर्लभ होती हैं और इनकी पहचान कर पाना बेहद कठिन होता है। अब तक भारत में Metadon वंश की केवल छह प्रजातियाँ ही दर्ज की गई थीं।
दिल्ली रिज और पश्चिमी घाट में खोज
Metadon ghorpadei की खोज दिल्ली के नॉर्दर्न रिज फॉरेस्ट में हुई, जो प्राचीन अरावली पर्वतमाला का विस्तार है। यह क्षेत्र अब एक खंडित शहरी वन में परिवर्तित हो चुका है, जो घने रिहायशी इलाकों और ट्रैफिक से घिरा हुआ है। यह खोज इस बात को रेखांकित करती है कि अत्यधिक मानव प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी दुर्लभ जीवों की उपस्थिति बनी रह सकती है।
वहीं Metadon reemeri प्रजाति की खोज तमिलनाडु के पश्चिमी घाट के सिरुवानी पर्वत क्षेत्र में हुई, जो विश्व स्तर पर जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में जाना जाता है और जहाँ उच्च स्तर की स्थानिकता (Endemism) पाई जाती है।
वैज्ञानिक पद्धतियाँ और शोध की महत्ता
यह खोज अमृता विश्व विद्यापीठम, कोयंबटूर के एच. शंकररामन और केरल कृषि विश्वविद्यालय के एस.एस. अनुज द्वारा की गई। शोध निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय पत्रिका “Zootaxa” में प्रकाशित हुए।
शोधकर्ताओं ने विस्तृत स्वरूपीय (morphological) विश्लेषण के साथ डीएनए जांच की मदद से इन प्रजातियों की नवीनता प्रमाणित की। इसके साथ-साथ उन्होंने भारत में पहले से ज्ञात Metadon वंश की छह अन्य प्रजातियों का पुनः वर्णन कर टैक्सोनॉमिक स्पष्टता को भी मजबूत किया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- माइक्रोडॉन्टिनी लार्वा चींटी के घोंसलों में रहते हैं — इस व्यवहार को मायर्मेकोफिली कहा जाता है।
- दिल्ली रिज, अरावली पर्वतमाला का विस्तार है।
- पश्चिमी घाट एक वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है, जहाँ उच्च स्थानिकता पाई जाती है।
- भारतीय उपमहाद्वीप से अब तक केवल 27 माइक्रोडॉन्टिनी प्रजातियाँ ज्ञात हैं।
संरक्षण संबंधी चिंता और आगे की राह
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि भारत के शहरी क्षेत्रों में अक्सर हरियाली पर ज़ोर दिया जाता है, लेकिन विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र और कीट जीवों की संरचना की उपेक्षा होती है, जिससे दुर्लभ कीटों के अस्तित्व पर खतरा मंडराता है।
पश्चिमी घाटों में संरक्षण मजबूत होने के बावजूद कीट वर्ग विशेष पर सीमित अध्ययन हुए हैं। वैश्विक रूप से भी माइक्रोडॉन्टिनी प्रजातियाँ अपनी विशेष जीवन-शैली के कारण संकटग्रस्त मानी जाती हैं।
वैज्ञानिकों ने क्षेत्रीय सर्वेक्षण, पारिस्थितिकी तंत्र की मैपिंग, मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण, आक्रामक पौधों का प्रबंधन और देशी वनस्पतियों की बहाली जैसे उपायों के साथ-साथ विंध्य, दक्कन और उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों में आणविक अनुवांशिकी (molecular phylogenetic) शोधों का आह्वान किया है।
यह खोज न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की जैव विविधता को सुरक्षित रखने की दिशा में एक नई जागरूकता भी उत्पन्न करती है।