भारत में डायबिटीज़ जांच के लिए HbA1c परीक्षण पर निर्भरता पर सवाल
भारत में डायबिटीज़ के निदान और निगरानी के लिए व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले ग्लायकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c) परीक्षण की विश्वसनीयता पर हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन ने सवाल खड़े कर दिए हैं। The Lancet Regional Health में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, HbA1c के परिणाम देश की असली मधुमेह स्थिति को सही ढंग से नहीं दर्शा सकते, जिससे रोग की वास्तविक व्यापकता का गलत अनुमान हो सकता है।
HbA1c परीक्षण: कैसे करता है कार्य और क्या हैं इसकी सीमाएं?
HbA1c परीक्षण दरअसल लाल रक्त कणों की उम्र के दौरान उनके साथ शर्करा (ग्लूकोज) के संयोजन को मापता है। यह परीक्षण लंबे समय तक रक्त में शर्करा के औसत स्तर का संकेत देने के लिए एक मानक उपकरण माना जाता है। लेकिन भारत जैसे देश में, जहां एनीमिया, हीमोग्लोबिन विकृतियाँ (haemoglobinopathies) और G6PD जैसी लाल रक्त कोशिका संबंधित विकृतियाँ आम हैं, वहां HbA1c मान गलत या भ्रामक हो सकते हैं।
इन स्थितियों में या तो हीमोग्लोबिन की संरचना या उसकी उम्र प्रभावित होती है, जिससे HbA1c का स्तर गलत आंका जा सकता है। इससे डायबिटीज़ के मामलों में या तो देर से निदान होता है या गलत निदान।
गलत निदान का खतरा और इलाज में देरी
अध्ययन के अनुसार, केवल HbA1c पर निर्भरता से डायबिटीज़ के कई मामलों में या तो देरी से निदान होता है या रोगी को गलत तरीके से मधुमेहग्रस्त घोषित कर दिया जाता है। फोर्टिस C-DOC के चेयरमैन डॉ. अनुप मिश्रा ने चेतावनी दी कि HbA1c पर अत्यधिक भरोसे से इलाज में चार साल तक की देरी संभव है, विशेष रूप से उन पुरुषों में जो G6PD की कमी से अनजान हैं। इससे भविष्य में जटिलताएं और बढ़ सकती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर
भारत के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में एनीमिया और अनुवांशिक रक्त विकृतियाँ आम हैं, जिससे इन इलाकों में HbA1c परीक्षण की विश्वसनीयता और भी घट जाती है। सह-लेखक डॉ. शशांक जोशी ने कहा कि शहरी अस्पतालों में भी, जहां तकनीकी संसाधन बेहतर होते हैं, HbA1c के परिणाम लाल रक्त कोशिका भिन्नताओं के कारण विकृत हो सकते हैं। साथ ही, भारत में प्रयोगशालाओं की गुणवत्ता नियंत्रण में असंगतता भी चिंता का विषय है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- HbA1c परीक्षण औसतन पिछले 2-3 महीनों के रक्त शर्करा स्तर को दर्शाता है।
- भारत की 50% से अधिक आबादी आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया से प्रभावित है।
- G6PD की कमी भारत के कुछ क्षेत्रों में 5–15% पुरुषों में पाई जाती है।
- केवल HbA1c आधारित सर्वेक्षण भारत की डायबिटीज़ की वास्तविक स्थिति को गलत तरीके से दर्शा सकते हैं।
भारत के लिए एक नया नैदानिक ढांचा
अध्ययन में भारत जैसे विविध और संसाधन-विभाजित देश के लिए एक “resource-adapted diagnostic framework” की सिफारिश की गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में, उपवास और ग्लूकोज सेवन के दो घंटे बाद के मानों के साथ OGTT (Oral Glucose Tolerance Test) को प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ-साथ सीमित स्वयं-निगरानी और सामान्य रक्त जांच की सलाह दी गई है।
उन्नत चिकित्सा संस्थानों में, HbA1c को OGTT के साथ संयोजन में उपयोग करने और लंबी अवधि की निगरानी के लिए फ्रक्टोसामिन जैसे वैकल्पिक संकेतकों और निरंतर ग्लूकोज मॉनिटरिंग की अनुशंसा की गई है।
भारत में डायबिटीज़ की सटीक पहचान और समय पर इलाज सुनिश्चित करने के लिए अब समय आ गया है कि हम केवल HbA1c पर निर्भर न रहकर बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाएं, जिससे हर वर्ग को सही और समय पर चिकित्सा मिल सके।