भारत में चमेली की फसल पर नए कीट ‘कॉन्टारिनिया इकार्डिफ्लोरेस’ की खोज

भारत में चमेली की फसल पर नए कीट ‘कॉन्टारिनिया इकार्डिफ्लोरेस’ की खोज

भारत के पुष्पविज्ञान क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कीटविज्ञान संबंधी उपलब्धि हासिल हुई है। पुणे स्थित आईसीएआर–फ्लोरिकल्चर अनुसंधान निदेशालय के वैज्ञानिकों ने चमेली की कलियों को नुकसान पहुंचाने वाली एक नई प्रजाति के ब्लॉसम मिज की पहचान की है। इस नई प्रजाति का नाम ‘कॉन्टारिनिया इकार्डिफ्लोरेस’ रखा गया है। यह कीट व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण फसल ‘जैस्मिनम सम्बक’ पर हमला करता पाया गया है। अनुसंधान दल का नेतृत्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डी. एम. फिराके ने किया। इस नई प्रजाति का नाम संस्थान के सम्मान में रखा गया है, जो पुष्पविज्ञान अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

खोज का महत्व और कृषि पर प्रभाव

ब्लॉसम मिज की ‘कॉन्टारिनिया’ वंश की प्रजातियां विश्वभर में सजावटी और खाद्य फसलों के लिए गंभीर कीट मानी जाती हैं। नई पहचानी गई प्रजाति चमेली की कलियों को संक्रमित कर उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर रही है।

चमेली भारत में व्यापक रूप से उगाई जाती है और इसका उपयोग इत्र उद्योग, धार्मिक अनुष्ठानों तथा फूलों के व्यापार में किया जाता है। कलियों के क्षतिग्रस्त होने से सीधे तौर पर पैदावार घटती है और किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। निर्यात के दृष्टिकोण से भी यह कीट एक गंभीर चुनौती बन सकता है।

आकृतिक और आनुवंशिक विशेषताएं

यह नई प्रजाति आकार-प्रकार में ‘कॉन्टारिनिया मैक्यूलिपेनिस’ से मिलती-जुलती है, जो पहले चमेली को संक्रमित करने वाली एकमात्र ज्ञात प्रजाति थी। हालांकि, वैज्ञानिक विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि ‘कॉन्टारिनिया इकार्डिफ्लोरेस’ आनुवंशिक रूप से अलग है।

शोधकर्ताओं ने समेकित वर्गिकी पद्धति अपनाई, जिसमें आकृतिक लक्षणों के साथ-साथ आणविक तकनीकों का उपयोग किया गया। मादा के फ्लैजेलोमियर, सर्सी तथा नर के एडीगस की संरचना में अंतर प्रमुख पहचान संकेतक पाए गए। इसके अतिरिक्त माइटोकॉन्ड्रियल साइटोक्रोम ऑक्सीडेज उप-इकाई–I (सीओआई) जीन के एक आंशिक क्षेत्र का अनुक्रमण किया गया। यह जीन डीएनए बारकोडिंग में व्यापक रूप से उपयोग होता है और सटीक प्रजाति पहचान में सहायक है।

जीवन चक्र और प्रबंधन की चुनौती

इस नई प्रजाति का जीवन चक्र मात्र 16 से 21 दिनों में पूरा हो जाता है। इतनी कम अवधि में जीवन चक्र पूरा होने के कारण इसकी आबादी तेजी से बढ़ सकती है, जिससे संक्रमण का स्तर गंभीर हो जाता है। यही विशेषता इसे नियंत्रण के लिए कठिन कीट बनाती है।

तेजी से प्रजनन करने वाले कीटों के लिए पारंपरिक नियंत्रण उपाय अक्सर पर्याप्त नहीं होते। इसलिए प्रारंभिक पहचान, निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन रणनीतियों का विकास अत्यंत आवश्यक है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

* ‘कॉन्टारिनिया’ वंश से संबंधित कीट ‘सेसिडोमायिडी’ कुल के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें सामान्यतः गॉल मिज कहा जाता है।
* माइटोकॉन्ड्रियल सीओआई जीन का उपयोग डीएनए बारकोडिंग के माध्यम से प्रजाति पहचान में किया जाता है।
* ‘जैस्मिनम सम्बक’ भारत की एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक पुष्प फसल है।
* समेकित वर्गिकी पद्धति में आकृतिक और आणविक दोनों प्रकार के विश्लेषण शामिल होते हैं।

यह खोज भारत के पुष्पविज्ञान क्षेत्र के लिए एक चेतावनी और अवसर दोनों है। एक ओर जहां यह उभरती कीट चुनौतियों को रेखांकित करती है, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक अनुसंधान और उन्नत निदान तकनीकों के माध्यम से प्रभावी एवं पर्यावरण-अनुकूल कीट प्रबंधन रणनीतियां विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी है।

Originally written on February 25, 2026 and last modified on February 25, 2026.

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