भारत ने दर्ज की दो नई सिंथेटिक दुग्ध पशु नस्लें: पशुधन उत्पादकता और स्थानीय संरक्षण को मिली गति
भारत ने पशुधन क्षेत्र में एक नई उपलब्धि दर्ज करते हुए दो उच्च-दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली सिंथेटिक गाय नस्लों का पंजीकरण किया है, जो 10 माह की दुग्ध अवधि में 3,000 किलोग्राम से अधिक दूध देने में सक्षम हैं। इन नई नस्लों के साथ देश में कुल पंजीकृत पशुधन एवं कुक्कुट नस्लों की संख्या 246 हो गई है, जो उत्पादकता में वृद्धि और देशी नस्ल संरक्षण की दोहरी रणनीति को सुदृढ़ करती है।
नई पशुधन और कुक्कुट नस्लों का पंजीकरण
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (ICAR–NBAGR) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में 16 नव-पंजीकृत पशुधन एवं कुक्कुट नस्लों के प्रमाण पत्र वितरित किए। नस्लों के इस पंजीकरण से उन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त होती है और यह सरकार की नस्ल-विशिष्ट विकास योजनाओं में शामिल करने की दिशा में सहायक होता है।
दुग्ध उत्पादकता में बढ़त: सिंथेटिक नस्लों की भूमिका
पंजीकृत दो नई सिंथेटिक गाय नस्लें हैं — करन फ्राइज़ और वृंदावनी।
- करन फ्राइज़: हरियाणा स्थित राष्ट्रीय दुग्ध अनुसंधान संस्थान (NDRI) द्वारा विकसित। यह देशी थारपारकर गायों और विदेशी होल्स्टीन-फ्राइज़ियन सांडों के क्रॉस ब्रीडिंग से तैयार की गई है।
- वृंदावनी: उत्तर प्रदेश स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) द्वारा विकसित। यह होल्स्टीन-फ्राइज़ियन, ब्राउन स्विस, जर्सी और देशी हरियाणा गायों के संयोजन से तैयार की गई है।
इन नस्लों की दुग्ध उत्पादन क्षमता 3,000 किग्रा से अधिक है, जबकि अधिकांश देशी गायें एक लैक्टेशन अवधि में 1,000–2,000 किग्रा दूध देती हैं।
देशी नस्ल संरक्षण पर जोर
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को देखते हुए ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जात ने देशी आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। 16 में से 14 नस्लें पूर्णतः देशी हैं, जिनमें मेदिनी और रोहिखंडी गाय, मेलघाटी भैंस, पलामू और उदैपुरी बकरी, तथा नगामी मिथुन शामिल हैं। पूर्वी और दक्षिणी भारत की कई कुक्कुट और जलपक्षी नस्लें भी सूची में शामिल हैं, जिससे क्षेत्रीय जैव विविधता को बल मिला है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत में वर्तमान में 246 पंजीकृत पशुधन एवं कुक्कुट नस्लें हैं।
- करन फ्राइज़ और वृंदावनी भारत की मान्यता प्राप्त सिंथेटिक दुग्ध नस्लें हैं।
- ICAR ने 2008 से प्रतिवर्ष नस्ल पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की थी।
- नस्ल पंजीकरण से कानूनी संरक्षण और नस्ल-विशिष्ट विकास योजनाओं को बल मिलता है।
नीति महत्व और क्षेत्रीय प्रभाव
ICAR अधिकारियों के अनुसार सिंथेटिक नस्लें भारत की बढ़ती दुग्ध मांग को पूरा करने में सहायक हैं, जबकि देशी नस्लें जलवायु सहनशीलता और टिकाऊ पशुपालन की दृष्टि से आवश्यक हैं। अब तक पंजीकृत 242 देशी और 4 सिंथेटिक नस्लों के साथ यह पहल उत्पादकता, संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के संतुलन का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती है।
पंजीकरण प्रक्रिया आमतौर पर दो से पाँच वर्षों तक चलती है और इससे संरक्षण प्रोत्साहन योजनाओं की सुविधा भी मिलती है। इस अवसर पर देशी नस्ल संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को ICAR संरक्षण पुरस्कार भी प्रदान किए गए।
यह पहल भारत के पशुधन क्षेत्र को भविष्य के लिए अधिक सक्षम, समावेशी और सतत बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।