भारत-जर्मनी जलवायु वार्ता में अनुकूलन और लचीलापन पर जोर, 20 मिलियन यूरो अनुदान की घोषणा

भारत-जर्मनी जलवायु वार्ता में अनुकूलन और लचीलापन पर जोर, 20 मिलियन यूरो अनुदान की घोषणा

नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय जलवायु वार्ता के दौरान भारत और जर्मनी ने जलवायु अनुकूलन और लचीलेपन को मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इस संवाद में पारिस्थितिकी-आधारित दृष्टिकोणों को आगे बढ़ाने और भारत की आगामी राष्ट्रीय अनुकूलन योजना (एनएपी) को समर्थन देने पर विशेष ध्यान दिया गया। जर्मनी के संघीय पर्यावरण, जलवायु कार्रवाई, प्रकृति संरक्षण और परमाणु सुरक्षा मंत्रालय के राज्य सचिव योखन फ्लासबार्थ ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु पहल (आईकेआई) के तहत भारत के लिए 20 मिलियन यूरो तक की नई ‘लार्ज ग्रांट’ परियोजना की घोषणा की।

उच्च जोखिम वाले पारिस्थितिक तंत्रों के लिए 20 मिलियन यूरो अनुदान

यह परियोजना हिमालय, द्वीपीय क्षेत्र, पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत और निचले गंगा मैदान जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में लचीलापन बढ़ाने पर केंद्रित होगी। इसके अंतर्गत वन पुनर्स्थापन, जैव विविधता गलियारों को सुदृढ़ करना, बाढ़ और कटाव नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण तथा समुदाय-आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन जैसे पारिस्थितिकी-आधारित उपायों को बढ़ावा दिया जाएगा।

परियोजना भारत की राष्ट्रीय अनुकूलन योजना से जुड़े निगरानी एवं मूल्यांकन तंत्र को भी सशक्त करेगी। दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए मिश्रित वित्त (ब्लेंडेड फाइनेंस), जैव विविधता क्रेडिट और बीमा-आधारित जोखिम समाधान जैसे नवाचार वित्तीय तंत्रों की संभावनाओं का भी परीक्षण किया जाएगा।

राष्ट्रीय अनुकूलन योजना पर विशेष ध्यान

भारत की राष्ट्रीय अनुकूलन योजना पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत अंतिम चरण में है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु लचीलापन को योजनाओं और नीतियों में समाहित करने के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करना है।

जर्मनी ने इस योजना के क्रियान्वयन में सहयोग की प्रतिबद्धता जताई है, विशेषकर वन पारिस्थितिक तंत्र सुदृढ़ीकरण, जैव विविधता संरक्षण और प्रकृति-आधारित जलवायु समाधानों के क्षेत्र में। यह सहयोग द्विपक्षीय संबंधों को पर्यावरणीय स्थिरता के क्षेत्र में और मजबूत करेगा।

वैश्विक जलवायु नीति में अनुकूलन की बढ़ती भूमिका

अधिकारियों ने रेखांकित किया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल शमन (मिटिगेशन) पर्याप्त नहीं है, बल्कि अनुकूलन भी समान रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन (ईबीए) को लागत-प्रभावी रणनीति माना जा रहा है, जो जलवायु जोखिम को कम करने के साथ-साथ आजीविका सुदृढ़ीकरण और जैव विविधता संरक्षण में भी सहायक है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अंतरराष्ट्रीय जलवायु पहल (आईकेआई) जर्मन सरकार द्वारा वित्तपोषित कार्यक्रम है।
  • पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन (ईबीए) जैव विविधता और पारिस्थितिक सेवाओं के माध्यम से जलवायु जोखिम से निपटने की रणनीति है।
  • पश्चिमी घाट और हिमालय भारत के प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं।
  • ब्लेंडेड फाइनेंस में सार्वजनिक और निजी निवेश का संयोजन शामिल होता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि अनुकूलन रणनीतियों को बजटीय आवंटन और जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन में परिवर्तित करना आवश्यक है। भारत-जर्मनी साझेदारी जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में लचीलापन निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

Originally written on February 27, 2026 and last modified on February 27, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *