भारत के नेतृत्व में बदल सकता है किम्बरली प्रक्रिया का भविष्य
दुनिया में खनिज संपदाओं के शांति-सम्मत और नैतिक व्यापार को सुनिश्चित करने के लिए Kimberley Process Certification Scheme (KPCS) एक प्रमुख वैश्विक तंत्र है, जिसका उद्देश्य “कॉनफ्लिक्ट डायमंड्स” यानी संघर्षरत क्षेत्रों से आने वाले हीरों के व्यापार को रोकना है। हालांकि भारत स्वयं हीरों का उत्पादक नहीं है, लेकिन वैश्विक हीरा मूल्य श्रृंखला में उसकी केंद्रीय भूमिका इसे इस प्रक्रिया में सार्थक सुधार लाने का एक सशक्त माध्यम बनाती है।
किम्बरली प्रक्रिया: कार्यप्रणाली और भारत की भूमिका
KPCS केवल उन्हीं सदस्य देशों के बीच कच्चे हीरों के व्यापार की अनुमति देता है, जो इसकी प्रमाणन और नियंत्रण आवश्यकताओं का पालन करते हैं। अंगोला, बोत्सवाना, कनाडा, कांगो, नामीबिया और रूस जैसे देश विश्व के 85% से अधिक कच्चे हीरों का उत्पादन करते हैं।
भारत भले ही खुद हीरा नहीं निकालता, लेकिन वह विश्व के लगभग 40% कच्चे हीरों का आयात करता है। सूरत और मुंबई जैसे शहरों में स्थित विशाल कटाई और पॉलिशिंग उद्योगों के कारण भारत विश्व का सबसे बड़ा पॉलिश्ड डायमंड निर्यातक है। भारत से तैयार हीरे अमेरिका, चीन, हांगकांग, इज़रायल और UAE जैसे देशों को भेजे जाते हैं।
“कॉनफ्लिक्ट डायमंड्स” की परिभाषा की सीमाएं
Kimberley प्रक्रिया की सबसे बड़ी आलोचना इसकी संकीर्ण परिभाषा को लेकर है, जो केवल उन हीरों को “कॉनफ्लिक्ट डायमंड्स” मानती है, जिन्हें विद्रोही समूह वैध सरकारों के खिलाफ संघर्ष के लिए वित्त पोषण में उपयोग करते हैं। इसमें निम्न समस्याएं शामिल नहीं हैं:
- राज्य प्रायोजित हिंसा
- मानवाधिकार उल्लंघन
- पर्यावरणीय क्षति
- अवैध तस्करी और खनन शोषण
इसके अतिरिक्त, KPCS में निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, जिससे राजनीतिक वीटो के माध्यम से सुधारों को रोका जा सकता है।
पिछले अनुभवों से मिले सबक
2013 में Central African Republic को हीरा निर्यात पर प्रतिबंध झेलना पड़ा, जिसे 2024 में फिर से KPCS में शामिल किया गया। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, केवल प्रतिबंध लगाना ही समाधान नहीं है—इसके बिना समानांतर समर्थन उपायों के, प्रतिबंध से तस्करी और हिंसा और बढ़ सकती है। इस अनुभव ने दिखाया कि स्थानीय खनन समुदायों की सुरक्षा और सतत विकास के लिए व्यापक दृष्टिकोण जरूरी है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- KPCS केवल प्रमाणित सदस्य देशों को ही कच्चे हीरों का व्यापार करने की अनुमति देता है।
- भारत स्वयं हीरा उत्पादक नहीं है, लेकिन वह विश्व के 40% कच्चे हीरों का आयात करता है।
- वर्तमान में “कॉनफ्लिक्ट डायमंड्स” की परिभाषा केवल विद्रोही-प्रायोजित संघर्षों तक सीमित है।
- KPCS की स्थापना 2003 में हुई थी और इसका उद्देश्य हिंसात्मक हीरा व्यापार को रोकना है।
भारत के नेतृत्व में संभावित सुधार
भारत KPCS को अधिक समावेशी और पारदर्शी बनाने की दिशा में कई रणनीतिक पहल कर सकता है:
- विद्रोह से परे मानवाधिकार और हिंसा से जुड़े जोखिमों पर ध्यान देने के लिए तकनीकी कार्य समूह का गठन।
- ब्लॉकचेन तकनीक के माध्यम से डिजिटल और छेड़छाड़-रहित प्रमाणपत्रों का प्रचार।
- अफ्रीका में क्षेत्रीय तकनीकी केंद्रों की स्थापना, जो प्रशिक्षण, आईटी समर्थन और फोरेंसिक उपकरणों से सुसज्जित हों।
- KP के उद्देश्यों को सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) के साथ जोड़ना ताकि हीरे की आय स्थानीय विकास में उपयोग हो सके।
भारत की भूमिका अब केवल हीरा प्रसंस्करण तक सीमित नहीं रह सकती। अपने अनुभव और वैश्विक संपर्कों का उपयोग करते हुए, भारत KPCS को एक अधिक विकास-उन्मुख, न्यायसंगत और टिकाऊ वैश्विक तंत्र में परिवर्तित कर सकता है।