भारत का पहला इनफ्लेटेबल स्पेस हैबिटेट: ‘अंतरिक्षHAB’ से अंतरिक्ष युग में नया अध्याय

भारत का पहला इनफ्लेटेबल स्पेस हैबिटेट: ‘अंतरिक्षHAB’ से अंतरिक्ष युग में नया अध्याय

भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में एक नए मील के पत्थर की ओर बढ़ रहा है, जहां बेंगलुरु स्थित एक स्टार्टअप ‘आकाशलब्धि’ देश का पहला इनफ्लेटेबल स्पेस हैबिटेट लॉन्च करने की तैयारी में है। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) से उद्भवित यह स्टार्टअप अब अपनी तकनीक का कक्षा में प्रदर्शन करने को तैयार है, जिससे भविष्य के दीर्घकालिक मानव मिशनों की संभावनाएं सशक्त होंगी।

इनफ्लेटेबल हैबिटेट्स और ‘अंतरिक्षHAB’ की कल्पना

अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन जैसे पारंपरिक स्पेस प्लेटफॉर्म लंबे समय से लागत, भार और सीमित आवासीय आयतन की चुनौतियों से जूझते रहे हैं। आकाशलब्धि का इनफ्लेटेबल हैबिटेट — ‘अंतरिक्षHAB’ — इन्हीं समस्याओं को हल करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

इस तकनीक के तहत एक कॉम्पैक्ट मॉड्यूल को रॉकेट से भेजा जाएगा, जिसे कक्षा में पहुंचने के बाद फुलाया जाएगा। इससे आवासीय स्थान में काफी वृद्धि संभव होगी। आगामी मिशन में 70 क्यूबिक मीटर क्षमता वाला मॉड्यूल भेजा जाएगा, जबकि अंतिम संस्करण लगभग 300 क्यूबिक मीटर का होगा — जो निम्न पृथ्वी कक्षा में मानव मिशनों के लिए उपयुक्त रहेगा।

यूरोपीय सहयोग और स्विट्ज़रलैंड में परीक्षण

इस परियोजना को यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और उसके सहयोगियों से संस्थागत सहायता एवं अनुदान प्राप्त हो रहा है। इसके महत्वपूर्ण सुरक्षा परीक्षण स्विट्ज़रलैंड के वर्सुचस्टोलन हैगरबाख (Versuchsstollen Hagerbach) भूमिगत प्रयोगशाला में संपन्न हुए। यह प्रयोगशाला प्राकृतिक चट्टानों के भीतर स्थित है और विकिरण सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती, पृथक प्रभाव, और दीर्घकालिक प्रदर्शन के यथार्थवादी परीक्षणों के लिए उपयुक्त है।

तकनीकी परिपक्वता और कक्षा प्रदर्शन योजना

आकाशलब्धि ने ‘टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल 6’ (TRL-6) तक पहुँचने के लिए व्यापक परीक्षण किए हैं, जिनमें दबाव एवं रिसाव परीक्षण, थर्मल साइकलिंग, तेज़ वृद्धावस्था परीक्षण, और माइक्रोमीटियोरॉइड एवं अंतरिक्ष मलबे से टक्कर की सिमुलेशन शामिल हैं।

फुलाने की प्रक्रिया और नियंत्रण प्रणाली की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए कई बार मॉड्यूल को तैनात किया गया। इन परीक्षणों में एकीकृत सेंसर नेटवर्क और डिजिटल ट्विन तकनीक का उपयोग किया गया, जिससे वास्तविक समय में प्रदर्शन की निगरानी संभव हो सकी।

जुलाई में स्पेन की कंपनी PLD Space के रॉकेट से इस मॉड्यूल का प्रक्षेपण प्रस्तावित है, जिसमें इसके नियंत्रित ‘डी-ऑर्बिट’ और वायुमंडलीय पुनःप्रवेश की प्रक्रिया भी शामिल होगी — जिससे अंत-जीवन चरण और सामग्री की टिकाऊता का अध्ययन किया जा सके।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • इनफ्लेटेबल हैबिटेट्स पारंपरिक रिगिड मॉड्यूल की तुलना में वॉल्यूम-टू-मास अनुपात में अधिक कुशल होते हैं।
  • ‘टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल 6’ का अर्थ है कि तकनीक का परीक्षण संबंधित वातावरण में सफलतापूर्वक किया गया है।
  • लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) की स्थिरता के लिए अब नियंत्रित डी-ऑर्बिट और मलबा प्रबंधन अनिवार्य हो गया है।
  • भूमिगत प्रयोगशालाएं विकिरण और संरचनात्मक सुरक्षा के अध्ययन के लिए वैश्विक रूप से प्रयोग होती हैं।

भारत–स्विट्ज़रलैंड सहयोग: स्पेस टेक्नोलॉजी में नई राह

यह परियोजना भारत और स्विट्ज़रलैंड के बीच उच्च तकनीक सहयोग को दर्शाती है। भारतीय भागीदारों में IISc, IIT रुड़की, और IIT दिल्ली शामिल हैं, जो अंतरिक्ष संरचनाओं, सामग्री विज्ञान, प्रणाली अभियांत्रिकी और मानव-केंद्रित डिज़ाइन में विशेषज्ञता प्रदान कर रहे हैं।

वहीं स्विट्ज़रलैंड की ETH ज्यूरिख, EMPA, और पॉल शेरेर संस्थान इस परियोजना में सामग्री विज्ञान, विकिरण अध्ययन और प्रमाणीकरण पद्धतियों का समर्थन कर रहे हैं।

यह सहयोग पृथ्वी आधारित सुरक्षा मानकों को कक्षा में अपनाने की दिशा में एक अभिनव प्रयास है, जिससे अंतरिक्ष अवसंरचना के नए युग की नींव रखी जा रही है।

Originally written on January 28, 2026 and last modified on January 28, 2026.

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