भारत-इंडोनेशिया नौसैनिक साझेदारी को नई गति: बेलावन बंदरगाह पर प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन की सफल यात्रा
भारत और इंडोनेशिया ने भारतीय नौसेना के प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (1TS) की बेलावन बंदरगाह यात्रा के माध्यम से समुद्री सहयोग को और सुदृढ़ किया है। यह यात्रा भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” और “महासागर (MAHASAGAR)” दृष्टिकोण के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा देना है।
बेलावन में प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन की उपस्थिति
INS तीर, INS शार्दूल, INS सुजाता और ICGS सारथी से युक्त भारतीय नौसेना का प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन 23 जनवरी 2026 को तीन दिवसीय बंदरगाह यात्रा पूर्ण कर बेलावन (इंडोनेशिया) से रवाना हुआ। इस दौरान भारतीय नौसैनिकों और प्रशिक्षणार्थियों ने इंडोनेशियाई नौसेना के साथ व्यापक पेशेवर संवाद और अभ्यास किए।
उच्चस्तरीय नौसैनिक संवाद
1TS के वरिष्ठ अधिकारी कैप्टन टीजो के जोसेफ और स्क्वाड्रन के कमांडिंग अधिकारियों ने इंडोनेशियाई नौसेना के कोमारमाडा I (Koarmada I) के कमांडर रियर एडमिरल डेनी सेप्टिआना से मुलाकात की। बातचीत में साझा समुद्री हित, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ, और गहन नौसेना सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
पेशेवर, सांस्कृतिक और प्रशिक्षण संबंधी कार्यक्रम
बंदरगाह यात्रा के दौरान:
- भारतीय नौसेना और भारत के महावाणिज्य दूतावास, मेदान द्वारा संयुक्त रूप से एक ऑनबोर्ड स्वागत समारोह आयोजित किया गया, जिसमें वरिष्ठ इंडोनेशियाई नौसैनिक अधिकारी सम्मिलित हुए।
- भारतीय प्रशिक्षणार्थियों ने इंडोनेशियाई नौसेना क्षेत्रीय कमान I की सुविधाओं का दौरा किया।
- संयुक्त खेल प्रतियोगिताएं, योग सत्र और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से आपसी सौहार्द बढ़ा।
- जहाजों को स्थानीय स्कूली बच्चों के लिए खोला गया, जिससे जनसंपर्क और जनभागीदारी को बल मिला।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत और इंडोनेशिया दोनों Indian Ocean Naval Symposium (IONS) के सदस्य हैं।
- MAHASAGAR पहल का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना है।
- Koarmada I, इंडोनेशिया की पश्चिमी समुद्री क्षेत्र की नौसैनिक कमान है।
- Act East Policy भारत की दक्षिण-पूर्व एशिया केंद्रित विदेश नीति है।
इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक महत्त्व
यह तैनाती भारत द्वारा इंडोनेशिया के साथ समुद्री सहभागिता को दी जा रही रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाती है। यह यात्रा आपसी विश्वास, सहयोगात्मक क्षमताओं और हिंद महासागर व दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थिर, सुरक्षित और सहकारी समुद्री वातावरण को प्रोत्साहित करने की भारत की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट करती है।