भारतीय सरसों फसल पर छाया “ओरोबंके” संकट: खाद्य तेल आत्मनिर्भरता पर खतरा

भारतीय सरसों फसल पर छाया “ओरोबंके” संकट: खाद्य तेल आत्मनिर्भरता पर खतरा

भारत में खाद्य तेलों के प्रमुख देशी स्रोत के रूप में सरसों का विशेष स्थान है। लगभग 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाने वाली यह फसल न केवल किसानों की आजीविका का आधार है, बल्कि देश की खाद्य तेल सुरक्षा की रीढ़ भी है। परंतु वर्तमान में यह फसल एक गंभीर जैविक संकट से जूझ रही है — एक परजीवी खरपतवार ओरोबंके एजिप्टियाका (Orobanche aegyptiaca) के कारण, जिसे स्थानीय भाषा में “मारगोझा” भी कहा जाता है।

ओरोबंके एक जड़ परजीवी पौधा है, जो सरसों की जड़ों से पोषक तत्व, कार्बन और पानी सोख लेता है। यह परजीवी भूमिगत स्तर पर प्रारंभिक चरणों में ही फसल को नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधों में पीला पड़ना, मुरझाना और विकास रुकना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप बीज की उपज में भारी गिरावट देखी जा रही है।

हरियाणा और राजस्थान के किसान, विशेषकर सिरसा जिले में, रिपोर्ट कर रहे हैं कि पहले जहाँ औसत उत्पादन 9–12 क्विंटल प्रति एकड़ होता था, वह अब 6 क्विंटल प्रति एकड़ तक गिर चुका है — वो भी अनुशंसित हर्बीसाइड्स का उपयोग करने के बावजूद।

दक्षिण एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर, जोधपुर के निदेशक भगीरथ चौधरी के अनुसार, ओरोबंके सरसों के लिए सबसे बड़ा और “छिपा हुआ खतरा” बन चुका है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यह खरपतवार शुरुआती अवस्था में मिट्टी के नीचे ही रहता है और जब तक यह सतह पर उभरता है, तब तक काफी फसल नुकसान हो चुका होता है।

प्रत्येक ओरोबंके पौधा हजारों सूक्ष्म बीज उत्पन्न करता है, जो 20 वर्षों तक मिट्टी में जीवित रह सकते हैं, जिससे यह खरपतवार बार-बार सरसों उगाई जाने वाले क्षेत्रों में तेजी से फैलता है और स्थायी बीज बैंक बना लेता है।

भारत में सालाना कुल 10.5 से 10.6 मिलियन टन देशी खाद्य तेल उत्पादन में से सरसों अकेले 4 मिलियन टन से अधिक का योगदान देती है। लेकिन इसके बावजूद भारत को 16 मिलियन टन खाद्य तेल का आयात करना पड़ता है, जिसकी लागत 2024–25 में 18 अरब डॉलर से अधिक रही।

इस परजीवी के कारण सरसों की उपज में गिरावट देश की खाद्य तेल आत्मनिर्भरता को कमजोर कर सकती है और आयात निर्भरता को और बढ़ा सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा संकट गहरा सकता है।

परंपरागत हर्बीसाइड जैसे ग्लायफोसेट सामान्य सरसों किस्मों पर प्रभावी तो हैं, लेकिन असुरक्षित भी हैं। हाल ही में कुछ किसान इमिडाजोलिनोन-प्रतिरोधी नई किस्में अपना रहे हैं, जिससे शुरुआती परिणाम उत्साहजनक हैं।

साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एकाधिक हर्बीसाइड-प्रतिरोधी जीएम सरसों किस्में भी विकसित की हैं। अब नीति निर्धारकों के समक्ष यह चुनौती है कि:

  • वैज्ञानिक नवाचार को अनुमति दी जाए या नहीं
  • किसानों की आर्थिक सुरक्षा और खाद्य तेल आत्मनिर्भरता को कैसे संतुलित किया जाए
  • और फसल नियमन और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच कैसे संतुलन बने
  • ओरोबंके एजिप्टियाका एक भूमिगत जड़ परजीवी खरपतवार है, जो सरसों की फसल को प्रभावित करता है।
  • इसके बीज मिट्टी में 20 साल तक जीवित रह सकते हैं।
  • सरसों भारत की सबसे बड़ी देशी खाद्य तेल फसल है।
  • भारत सालाना 16 मिलियन टन खाद्य तेल का आयात करता है।

इस संकट को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह न केवल सरसों उत्पादकों को आर्थिक रूप से प्रभावित करेगा, बल्कि भारत की खाद्य तेल सुरक्षा को भी दीर्घकालिक रूप से खतरे में डाल सकता है। अब आवश्यकता है नीति, विज्ञान और किसानों के अनुभवों के समन्वय की, ताकि इस छिपे हुए खतरे से समय रहते निपटा जा सके।

Originally written on January 13, 2026 and last modified on January 13, 2026.

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