भारतीय मूल के वैज्ञानिक वीराभद्रन रमणाथन को क्राफोर्ड पुरस्कार: जलवायु विज्ञान में वैश्विक योगदान का सम्मान
जलवायु परिवर्तन की हमारी समझ को मूल रूप से बदलने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिक वीराभद्रन रमणाथन को क्राफोर्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जो भू-विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल के समकक्ष माना जाता है। 81 वर्षीय रमणाथन का शोध कार्य न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐतिहासिक रहा है, बल्कि इसने वैश्विक पर्यावरण नीति को भी गहराई से प्रभावित किया है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा यात्रा
रमणाथन का जन्म दक्षिण भारत में हुआ था, जहाँ उन्होंने बैंगलोर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उच्च शिक्षा के लिए वे अपने बीसवें दशक में अमेरिका चले गए। प्रारंभिक करियर में उन्होंने रेफ्रिजरेशन उद्योग में कार्य किया, जहाँ वे शीतलन गैसों में लीकेज की जांच करते थे। यहीं से उनके अंदर औद्योगिक रसायनों के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक जिज्ञासा उत्पन्न हुई, जिसने उनके शोध की दिशा तय की।
ट्रेस गैसों की गर्मी बढ़ाने वाली शक्ति की खोज
1970 के दशक में NASA के लैंगली रिसर्च सेंटर में कार्यरत रहते हुए रमणाथन ने यह खोज की कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) जैसे गैसें अत्यधिक ऊष्मा को संचित कर सकती हैं। 1975 में ‘Science’ पत्रिका में प्रकाशित उनके शोध में यह दर्शाया गया कि एक CFC अणु, कार्बन डाइऑक्साइड से हजारों गुना अधिक पृथ्वी को गर्म कर सकता है। यह पहली बार था जब किसी ने यह वैज्ञानिक प्रमाण दिया कि CO₂ के अलावा भी अन्य गैसें वैश्विक तापवृद्धि का बड़ा कारण बन सकती हैं।
जलवायु नीति पर वैज्ञानिक प्रभाव
अपने आगे के कार्य में रमणाथन ने यह भी सिद्ध किया कि मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें भी अपेक्षाकृत तेज़ी से ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा सकती हैं। उनका शोध 1987 के मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का आधार बना, जिसके अंतर्गत CFCs के वैश्विक उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया। यह समझौता अब तक का सबसे सफल पर्यावरणीय समझौता माना जाता है, जिसने पृथ्वी को और अधिक गर्म होने से बचाया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- क्राफोर्ड पुरस्कार स्वीडन की रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज़ द्वारा प्रदान किया जाता है।
- CFCs ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें भी होती हैं।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अब तक का सबसे प्रभावशाली पर्यावरणीय समझौता माना जाता है।
- एटमॉस्फेरिक ब्राउन क्लाउड्स मानसूनी पैटर्न और क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित करते हैं।
विज्ञान, नैतिकता और जलवायु नेतृत्व
सैद्धांतिक अनुसंधान से आगे बढ़ते हुए रमणाथन ने उपग्रहों, गुब्बारों और जहाजों की मदद से वायुमंडल का प्रत्यक्ष अध्ययन किया। उन्होंने दक्षिण एशिया में एटमॉस्फेरिक ब्राउन क्लाउड्स पर अग्रणी शोध किया, जिससे यह पता चला कि वायु प्रदूषण जहां एक ओर अस्थायी रूप से वैश्विक तापमान को ढक सकता है, वहीं यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक भी है।
रमणाथन पोंटिफिकल एकेडमी ऑफ साइंसेज के सदस्य भी रहे हैं, और तीन पोपों को पर्यावरण, नैतिकता और सामाजिक न्याय से जुड़ी सलाह प्रदान कर चुके हैं।
वीराभद्रन रमणाथन की यह उपलब्धि न केवल भारत के लिए गर्व की बात है, बल्कि यह वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक प्रेरणा है कि विज्ञान और नीति जब मिलकर काम करें, तो विश्व को एक नवीन, सतत और न्यायपूर्ण दिशा में ले जाया जा सकता है।