भारतीय नौसेना के एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों के लिए 7,995 करोड़ रुपये का समर्थन समझौता
भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ नौसेना के एमएच-60आर सीहॉक (MH-60R Seahawk) हेलीकॉप्टरों के लिए ₹7,995 करोड़ का एक व्यापक फॉलो-ऑन सपोर्ट पैकेज समझौता किया है। यह समझौता अमेरिकी “फॉरेन मिलिट्री सेल्स” (FMS) ढांचे के तहत हुआ है और इसका उद्देश्य नौसेना में शामिल 24 बहु-भूमिका वाले समुद्री हेलीकॉप्टरों की दीर्घकालिक परिचालन क्षमता सुनिश्चित करना है।
समर्थन पैकेज का दायरा
इस समझौते के तहत स्पेयर पार्ट्स, सहायक उपकरण, प्रशिक्षण मॉड्यूल, तकनीकी सहायता और मरम्मत प्रणालियाँ प्रदान की जाएंगी। इसमें महत्वपूर्ण पुर्जों के प्रतिस्थापन और पुनःपूर्ति की व्यवस्था भी शामिल है। लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित एमएच-60आर एक सर्व-कालिक (all-weather) हेलीकॉप्टर है, जो पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW), निगरानी और विभिन्न समुद्री अभियानों के लिए सक्षम है। यह भारत की नौसेना को अत्याधुनिक सेंसर और हथियार प्रणालियों से सुसज्जित करता है।
आत्मनिर्भरता को मजबूती देने की दिशा में कदम
इस समझौते की विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत भारत में ही मरम्मत और रखरखाव सुविधाओं की स्थापना की जाएगी। इन सुविधाओं के माध्यम से हेलीकॉप्टरों के मध्यम-स्तरीय निरीक्षण और पुर्जों की मरम्मत देश में ही की जा सकेगी। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह पहल बाहरी निर्भरता को कम करेगी और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के लक्ष्यों को सुदृढ़ बनाएगी।
पृष्ठभूमि और रणनीतिक संदर्भ
भारत ने फरवरी 2020 में 24 एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों की मूल खरीद का अनुबंध किया था। यह नवीनतम समर्थन समझौता ऐसे समय में हुआ है जब भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ से जुड़े आर्थिक तनाव चल रहे हैं, फिर भी यह समझौता दोनों देशों के बीच सतत रक्षा सहयोग को दर्शाता है। ब्लैकहॉक परिवार के इस समुद्री संस्करण से भारतीय नौसेना की विमानन क्षमता और बहु-आयामी समुद्री अभियानों की तैयारी में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- समझौते का मूल्य ₹7,995 करोड़ है।
- 24 एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों की मूल खरीद फरवरी 2020 में हुई थी।
- पैकेज में स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और मरम्मत सुविधाएँ शामिल हैं।
- भारत में रखरखाव केंद्र “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्यों के अनुरूप हैं।
नौसैनिक तत्परता पर प्रभाव
देश में रखरखाव बुनियादी ढाँचा स्थापित होने से इन हेलीकॉप्टरों की परिचालन उपलब्धता बढ़ेगी और रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भारतीय एमएसएमई को भागीदारी का अवसर मिलेगा। यह समझौता भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करता है, साथ ही अमेरिका के साथ रक्षा-औद्योगिक सहयोग को और गहरा बनाता है। इससे भारतीय नौसेना की तकनीकी दक्षता और सामरिक तैयारियों में दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होगी।