भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोड़ी अवशेष श्रीलंका प्रेषित: भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की महत्वपूर्ण पहल
भारत ने एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रयास के तहत भगवान बुद्ध के पवित्र देवनीमोड़ी अवशेषों को श्रीलंका में सार्वजनिक दर्शन हेतु भेजा है। ये अवशेष 4 से 10 फरवरी 2026 तक कोलंबो के प्रतिष्ठित गंगारामाया मंदिर में आम जनता के लिए प्रदर्शित किए जाएंगे। यह आयोजन भारत और श्रीलंका के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
सम्मानपूर्वक विदाई और उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल
गुजरात के वडोदरा स्थित महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय से इन पवित्र अवशेषों को पूरे राजकीय सम्मान के साथ रवाना किया गया। विदाई समारोह में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पुष्पांजलि अर्पित की और गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया। प्रतिनिधिमंडल में राज्यपाल आचार्य देवव्रत, उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी, वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु तथा अधिकारी शामिल हैं। भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से अवशेष दिल्ली होते हुए कोलंबो पहुंचाए गए हैं।
आध्यात्मिक और सभ्यतागत महत्व
भारत, जो बौद्ध धर्म का जन्मस्थल है, अपने वैश्विक सांस्कृतिक उत्तरदायित्व के रूप में इन अवशेषों को श्रीलंका भेज रहा है। यह यात्रा भारत और श्रीलंका के बीच गहरे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को उजागर करती है। कोलंबो स्थित गंगारामाया मंदिर, श्रीलंका के सबसे पूजनीय बौद्ध स्थलों में से एक है, जहां ये अवशेष श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखे गए हैं।
देवनीमोड़ी अवशेषों का पुरातात्विक महत्व
ये अवशेष गुजरात के अरावली जिले में स्थित देवनीमोड़ी पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुए थे। इस स्थल की खुदाई 1957 में पुरातत्वविद् एस एन चौधरी द्वारा की गई थी, जिसमें प्रारंभिक ईसा पश्चात काल के महत्वपूर्ण बौद्ध अवशेष मिले। अवशेषों की अस्थि पेटिका हरे शिस्ट पत्थर की बनी है, जिस पर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में “दशबल शरीर निलय” लिखा है, जिसका अर्थ है—भगवान बुद्ध के शरीर के अवशेषों का निवास स्थान। इस पेटिका में तांबे की डिबिया, पवित्र भस्म, रेशमी कपड़ा, मोती, और सोने से मढ़ी चांदी-तांबे की शीशी सुरक्षित रखी गई है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- देवनीमोड़ी गुजरात का एक प्रमुख बौद्ध पुरातात्विक स्थल है।
- अवशेषों की लिपि ब्राह्मी है और भाषा संस्कृत।
- गंगारामाया मंदिर कोलंबो का एक प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थल है।
- बौद्ध अवशेष कूटनीति, भारत की सॉफ्ट पावर रणनीति का हिस्सा है।
क्षेत्रीय सद्भावना और सांस्कृतिक नेतृत्व
यह आयोजन भारत की जन-केंद्रित विदेश नीति और वैश्विक बौद्ध धरोहर के संरक्षक के रूप में उसकी भूमिका को सशक्त करता है। हाल के वर्षों में ऐसे ही पवित्र अवशेष थाईलैंड, मंगोलिया, वियतनाम, भूटान और रूस में भी प्रदर्शित किए गए हैं। भारत द्वारा अपनी इस सर्वाधिक पूजनीय विरासत को साझा करना, दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में आपसी विश्वास, शांति, सौहार्द और सहयोग को बढ़ावा देने का प्रतीक है।
इस तरह, देवनीमोड़ी अवशेषों की यह यात्रा भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और सभ्यतागत एकता का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनकर उभर रही है।