बोड़ा त्योहार: हिमाचल के हाटी जनजाति की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक उत्सव
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के ट्रांस-गिरी क्षेत्र और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में हाटी जनजाति द्वारा मनाया जाने वाला बोड़ा त्योहार (जिसे “माघो का त्योहार” भी कहा जाता है), एक महीने भर चलने वाला सबसे बड़ा वार्षिक सांस्कृतिक पर्व है। यह पर्व न केवल हाटी समुदाय की सामाजिक और धार्मिक जीवनशैली का परिचायक है, बल्कि इसकी मूल आदिवासी परंपराओं, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक अस्मिता को भी सहेजता है।
154 पंचायतों में फैले ट्रांस-गिरी क्षेत्र के तीन लाख से अधिक हाटी जनजातीय लोग इस पर्व को पारंपरिक उत्साह के साथ मनाते हैं। डॉ. आमी चंद कमल, केंद्रीय हाटी समिति के अध्यक्ष के अनुसार, यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि एक जीवंत सामाजिक परंपरा भी है।
इस त्योहार को हिमाचल प्रदेश के अलावा उत्तराखंड के जौनसार बाबर क्षेत्र, शिमला जिले के ऊपरी क्षेत्रों, चौपाल तहसील और किन्नौर जिले में भी मनाया जाता है।
बोड़ा त्योहार की शुरुआत पौष द्वादशी की पूर्व संध्या से होती है और यह तीन उप-त्योहारों में विभाजित रहता है। सबसे पहले आता है “भटियोज”, जिसमें घर-घर में पारंपरिक व्यंजन जैसे:
- पुड़े,
- बेदोली,
- पटांडे,
- ध्रोती,
- और गुड़ोली
बनाए जाते हैं और इन्हें ग्राम और कुल देवताओं को अर्पित किया जाता है।
त्योहार की गतिविधियाँ प्रायः शिरगुल महाराज, बिजाट महाराज और मासू महाराज जैसे स्थानीय देवताओं के मंदिरों से आरंभ होती हैं। कई गांवों में यह आयोजन थारी देवी के मंदिर के निकट सांझा आंगन में होता है, जहां समुदायिक गीत-संगीत और नृत्य का माहौल महीने भर बना रहता है।
बोड़ा त्योहार में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका को विशेष महत्व दिया गया है। इस अवसर पर:
- भाई अपनी विवाहित बहनों के पास “साजे का दूणा” (उपहार) लेकर जाते हैं।
- बहनें त्योहार के दौरान अपने मायके लौटती हैं, जहां उनका सम्मानित स्वागत होता है।
- हर घर में एक मांस का हिस्सा बहनों के आगमन तक सहेज कर रखा जाता है, जो पारिवारिक आत्मीयता को दर्शाता है।
त्योहार के आठवें दिन “खोड़ा” मनाया जाता है, जिसमें परिवारों में भोज होता है और परंपरा अनुसार नर बकरे का पका हुआ हृदय सबसे सम्मानित अतिथि को परोसा जाता है।
- बोड़ा त्योहार हाटी अनुसूचित जनजाति का सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव है।
- यह पौष द्वादशी की पूर्व संध्या से शुरू होकर पूरे एक महीने तक चलता है।
- हाटी जनजाति को अगस्त 2023 में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ।
- यह पर्व हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती जनजातीय क्षेत्रों में मनाया जाता है।
लगभग 56 वर्षों के संघर्ष के बाद, हाटी समुदाय को 4 अगस्त 2023 को संवैधानिक संशोधन के तहत अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला। बोड़ा त्योहार के “खोड़ा” के बाद “बोईदूत” परंपरा शुरू होती है, जिसमें हर घर में गांव वालों और रिश्तेदारों को सांझा भोजन के लिये आमंत्रित किया जाता है।
अनुसंधानकर्ता इस त्योहार की अनूठी परंपराओं का दस्तावेजीकरण करते आ रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बोड़ा त्योहार न केवल हाटी समुदाय की सांस्कृतिक आत्मा है, बल्कि एक जीवंत विरासत भी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित होती चली आ रही है।