बीएचयू में बैक्टीरियोफेज और एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न
वाराणसी स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में छठा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “आईसीबीआरएआर-2025” (International Conference on Bacteriophage Research and Antimicrobial Resistance) संपन्न हुआ। दो दिवसीय इस कार्यक्रम में विश्वभर के वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और शिक्षाविदों ने भाग लेकर बैक्टीरियोफेज विज्ञान और दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों से निपटने के लिए नए वैज्ञानिक दृष्टिकोणों पर विचार-विमर्श किया।
बैक्टीरियोफेज विज्ञान का वैश्विक महत्व
सम्मेलन में बैक्टीरियोफेज को पारंपरिक एंटीबायोटिक दवाओं के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि बैक्टीरियोफेज ऐसे वायरस होते हैं जो केवल बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं, और इन्हें चिकित्सीय रूप से उपयोग करके उन संक्रमणों का उपचार संभव है, जिन पर सामान्य एंटीबायोटिक असर नहीं करतीं। बढ़ती एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस की समस्या को देखते हुए, बैक्टीरियोफेज आधारित उपचार को एक सतत और पर्यावरण-अनुकूल समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
संस्थागत नेतृत्व और सहयोगात्मक शोध
बीएचयू के वरिष्ठ शिक्षाविदों और प्रशासकों ने सम्मेलन के दौरान बहुविषयक शोध और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंस जैसी जटिल समस्या से निपटने के लिए विश्वविद्यालयों को न केवल प्रयोगशालाओं और अनुसंधान सुविधाओं को सशक्त बनाना होगा, बल्कि उद्योग और नीति-निर्माताओं के साथ भी मिलकर काम करना होगा।
वैज्ञानिक विषय और प्रमुख चर्चाएँ
सम्मेलन में भारत और विदेशों से आए 250 से अधिक प्रतिनिधियों ने चिकित्सीय बैक्टीरियोफेज अनुप्रयोग, नियामक ढांचे, ट्रांसलेशनल माइक्रोबायोलॉजी, और दवा-प्रतिरोधी रोगजनकों से निपटने की रणनीतियों पर चर्चा की। वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि फेज-शोध को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के साथ एकीकृत करना आवश्यक है, ताकि इसके परिणाम व्यावहारिक स्तर पर लाभकारी साबित हों।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- आईसीबीआरएआर-2025 सम्मेलन बीएचयू, वाराणसी में आयोजित हुआ।
- इसका मुख्य विषय बैक्टीरियोफेज अनुसंधान और एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस था।
- इसमें भारत और विदेशों से 250 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
- बैक्टीरियोफेज को एंटीबायोटिक के प्राकृतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित यह सम्मेलन न केवल बैक्टीरियोफेज अनुसंधान को नई दिशा देने वाला साबित हुआ, बल्कि इसने भारत की भूमिका को वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में और सशक्त बनाया। इस पहल से उम्मीद है कि भविष्य में बीएचयू ट्रांसलेशनल माइक्रोबायोलॉजी और फेज-थेरेपी के क्षेत्र में एक प्रमुख शोध केंद्र के रूप में उभरेगा।