बिहार सिविल न्यायालय विधेयक 2026 से औपनिवेशिक कानून की समाप्ति
बिहार विधान सभा ने सर्वसम्मति से बिहार सिविल न्यायालय (कोर्ट) विधेयक, 2026 पारित कर दिया है, जिससे 1887 के औपनिवेशिक दौर के ‘बंगाल, आगरा और असम सिविल न्यायालय अधिनियम’ को प्रतिस्थापित कर दिया गया। यह कदम राज्य की अधीनस्थ सिविल अदालतों के ढांचे को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि यह विधेयक केवल 24 मिनट की संक्षिप्त बैठक के दौरान पारित किए गए चार विधेयकों में शामिल था।
सिविल न्यायालय संरचना का आधुनिकीकरण
1887 का अधिनियम ब्रिटिश शासनकाल में लागू किया गया था और लंबे समय तक बिहार सहित कई प्रांतों में सिविल अदालतों की संरचना को नियंत्रित करता रहा। बदलते न्यायिक परिदृश्य और प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नए कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
बिहार सिविल न्यायालय (कोर्ट) विधेयक, 2026 का उद्देश्य न्यायालयों की कार्यप्रणाली को समकालीन जरूरतों के अनुरूप बनाना, प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना तथा अधिकार-क्षेत्र और कार्य संचालन में स्पष्टता प्रदान करना है। इसका सर्वसम्मत पारित होना इस बात का संकेत है कि न्यायिक सुधार के मुद्दे पर राजनीतिक दलों में व्यापक सहमति है।
अन्य संशोधन विधेयक और भर्ती व्यवस्था में बदलाव
सिविल न्यायालय सुधार के साथ-साथ तीन अन्य संशोधन विधेयक भी ध्वनिमत से पारित किए गए। इनमें बिहार तकनीकी सेवा आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026; बिहार कर्मचारी चयन आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026; और बिहार नगर पालिका (संशोधन) विधेयक, 2026 शामिल हैं।
संशोधित प्रावधानों के अनुसार, सरकारी उपक्रमों जैसे बोर्ड और निगमों में द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के पदों पर भर्ती अब तकनीकी सेवा आयोग के माध्यम से की जाएगी। वहीं चतुर्थ श्रेणी के पदों पर नियुक्ति कर्मचारी चयन आयोग द्वारा की जाएगी। इससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और एकरूपता लाने का प्रयास किया गया है।
नगर निकाय प्रशासन में महत्वपूर्ण परिवर्तन
बिहार नगर पालिका (संशोधन) विधेयक, 2026 के तहत नगर निकायों में सशक्त स्थायी समितियों के गठन की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है। अब नगर पालिका और नगर निगम के सदस्य समिति के सदस्यों का चुनाव गुप्त मतदान के माध्यम से करेंगे, जबकि पहले महापौर इन समितियों का गठन करते थे।
सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि सशक्त स्थायी समितियों की बैठकें राज्य विधानमंडल के सत्र के दौरान आयोजित नहीं की जाएंगी, क्योंकि विधायक और विधान पार्षद इन समितियों के पदेन सदस्य होते हैं। यह कदम प्रशासनिक समन्वय और विधायी कार्यों में संतुलन सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* 1887 का ‘बंगाल, आगरा और असम सिविल न्यायालय अधिनियम’ एक औपनिवेशिक कानून था, जो अधीनस्थ सिविल अदालतों को नियंत्रित करता था।
* भारतीय संविधान का अनुच्छेद 372 राज्यों को संविधान-पूर्व कानूनों में संशोधन या निरसन का अधिकार देता है।
* ध्वनिमत एक संसदीय प्रक्रिया है, जिसमें मत विभाजन दर्ज किए बिना विधेयक पारित किया जाता है।
* सशक्त स्थायी समितियां शहरी स्थानीय निकायों में प्रमुख निर्णय लेने वाली इकाइयां होती हैं।
इन सभी विधेयकों का अल्प समय में पारित होना विधायी दक्षता का संकेत है। सिविल न्यायालय कानून में व्यापक सुधार, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और नगर निकायों में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करना बिहार के प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे को समकालीन शासन मानकों के अनुरूप ढालने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।