बिहार का एआई आधारित रिमोट ई-वोटिंग सिस्टम, चुनावी प्रक्रिया में डिजिटल नवाचार

बिहार का एआई आधारित रिमोट ई-वोटिंग सिस्टम, चुनावी प्रक्रिया में डिजिटल नवाचार

भारत के चुनावी परिदृश्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने औपचारिक प्रवेश कर लिया है। बिहार ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में मोबाइल-आधारित एआई संचालित रिमोट वोटिंग प्रणाली का अनावरण किया। बिहार राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा प्रस्तुत इस मंच को डिजिटल शासन के एक नवाचार के रूप में बताया गया, जिसका उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाना है। इस प्रणाली का पहला उपयोग वर्ष 2025 के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में किया गया था और भविष्य में इसे विधानसभा चुनावों तक विस्तारित किया जा सकता है।

भारत का पहला मोबाइल-सक्षम रिमोट वोटिंग प्लेटफॉर्म

बिहार का यह मॉडल देश का पहला मोबाइल-सक्षम रिमोट वोटिंग तंत्र माना जा रहा है। “ई-वोटिंग एसईसीबीएचआर” नामक समर्पित एंड्रॉयड एप्लिकेशन का विकास सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग ने राज्य निर्वाचन आयोग के सहयोग से किया है।

यह सुविधा उन मतदाताओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है जो मतदान केंद्र तक पहुँचने में असमर्थ रहते हैं, जैसे प्रवासी श्रमिक, छात्र, वरिष्ठ नागरिक, गर्भवती महिलाएँ, दिव्यांगजन और बीमार व्यक्ति। इस प्रणाली का उद्देश्य व्यक्तिगत स्मार्टफोन के माध्यम से सुरक्षित मतदान की सुविधा देकर मतदाता भागीदारी को बढ़ाना है।

सत्यापन प्रक्रिया और तकनीकी संरचना

मतदान करने के लिए उपयोगकर्ताओं को आधिकारिक एप डाउनलोड कर ओटीपी प्रमाणीकरण के माध्यम से अपनी पहचान सत्यापित करनी होती है। इसके बाद एआई आधारित चेहरे की पहचान और लाइव सेल्फी सत्यापन की प्रक्रिया होती है, जिसे निर्वाचक फोटो पहचान पत्र डेटाबेस से मिलान किया जाता है।

सुरक्षा के लिए दोहरी एन्क्रिप्शन, लाइवनेस डिटेक्शन और ब्लॉकचेन समर्थित डेटा भंडारण का उपयोग किया गया है। प्रत्येक वोट को एन्क्रिप्ट कर गुमनाम रूप से विकेंद्रीकृत डिजिटल लेजर में जोड़ा जाता है। मतगणना से पहले डिक्रिप्शन की अनुमति नहीं होती, और यह केवल अधिकृत अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर एवं बहु-कारक प्रमाणीकरण के माध्यम से संभव है। साथ ही, मतदाता सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल जैसी ऑडिट प्रणाली भी एकीकृत की गई है।

सुरक्षा दावे और संभावित चुनौतियाँ

अधिकारियों के अनुसार ब्लॉकचेन तकनीक छेड़छाड़-रोधी है, क्योंकि किसी एक वोट में बदलाव के लिए पूरे वितरित लेजर को बदलना पड़ेगा। वोट को संग्रहित करने से पहले मतदाता की पहचान और मत को अलग कर दिया जाता है, जिससे गोपनीयता बनी रहती है। मतगणना के समय रिटर्निंग ऑफिसर के डिजिटल सिग्नेचर प्रमाणपत्र और पोस्ट-पोल हैश सत्यापन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

हालाँकि, इस प्रणाली को लेकर कुछ चिंताएँ भी सामने आई हैं। पहचान की नकल, एक ही डिवाइस के साझा उपयोग और चेहरे की पहचान में त्रुटियों की संभावना जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। फिलहाल यह प्रणाली केवल एंड्रॉयड उपकरणों पर उपलब्ध है, जिससे सार्वभौमिक पहुँच सीमित हो सकती है। पायलट चरण में 14,804 प्रयासों में से 3,830 मॉक पंजीकरण सफल रहे, जो इसकी व्यवहार्यता के साथ तकनीकी सुधार की आवश्यकता को भी दर्शाता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

* ईपीआईसी का पूर्ण रूप निर्वाचक फोटो पहचान पत्र है, जिसे निर्वाचन आयोग जारी करता है।
* ब्लॉकचेन एक विकेंद्रीकृत डिजिटल लेजर तकनीक है, जो डेटा को छेड़छाड़ से सुरक्षित रखने के लिए उपयोग होती है।
* सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
* वीवीपैट प्रणाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में डाले गए वोट की पुष्टि की सुविधा प्रदान करती है।

बिहार की यह पहल भारत में चुनावी प्रौद्योगिकी के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग मानी जा रही है। यदि सुरक्षा और गोपनीयता संबंधी चुनौतियों का प्रभावी समाधान किया जाता है, तो यह प्रणाली भविष्य में मतदान प्रक्रिया को अधिक समावेशी और सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

Originally written on February 20, 2026 and last modified on February 20, 2026.

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