बांग्लादेश में बीएनपी की जीत से दक्षिण एशिया की राजनीति में नया मोड़
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने आम चुनावों में भारी जीत का दावा करते हुए तारिक रहमान को देश का अगला प्रधानमंत्री घोषित किया है। यह परिणाम शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत देता है। भारत के लिए, जो बांग्लादेश के साथ लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा और गहरे ऐतिहासिक संबंध साझा करता है, यह राजनीतिक बदलाव कूटनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत की त्वरित प्रतिक्रिया और कूटनीतिक संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को चुनावी जीत के लिए बधाई देते हुए एक लोकतांत्रिक और प्रगतिशील बांग्लादेश के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। यह संदेश इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली नई सरकार के साथ सहयोगात्मक संबंध बनाए रखने के लिए तैयार है।
भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी, सीमा प्रबंधन और पूर्वोत्तर क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दे द्विपक्षीय संबंधों के प्रमुख स्तंभ हैं। ऐसे में नई सरकार के साथ संतुलित और व्यावहारिक संवाद भारत की प्राथमिकता रहेगी।
बीएनपी का ऐतिहासिक रुख और भारत-बांग्लादेश संबंध
खालिदा जिया के नेतृत्व में बीएनपी और भारत के संबंध कई बार तनावपूर्ण रहे। 1991–1996 और 2001–2006 के उनके कार्यकाल में सीमा पार उग्रवाद, जल बंटवारे और पारगमन अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न हुए। भारत ने उस समय उल्फा और एनडीएफबी जैसे संगठनों को शरण देने के आरोप लगाए थे।
बीएनपी का जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन भी द्विपक्षीय संबंधों में जटिलता का कारण बना। जिया ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए स्थलीय पारगमन का विरोध किया और भारतीय हस्तक्षेप के आरोप लगाए। इन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण नई सरकार की नीतियों पर विशेष नजर रखी जा रही है।
तारिक रहमान की नीतिगत प्राथमिकताएं
तारिक रहमान के घोषणापत्र में संप्रभुता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित विदेश नीति पर जोर दिया गया है। बीएनपी ने सीमा पर होने वाली हत्याओं के मुद्दे को उठाने, तीस्ता और पद्मा जैसी नदियों के जल बंटवारे को न्यायसंगत बनाने तथा आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता नीति अपनाने का वादा किया है।
रहमान ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि बांग्लादेश किसी भी उग्रवादी संगठन को शरण नहीं देगा और धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। उनके सलाहकारों ने भारत के साथ व्यापार, सुरक्षा और शिक्षा क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं को भी सकारात्मक बताया है।
चीन, पाकिस्तान और क्षेत्रीय समीकरण
विश्लेषकों का मानना है कि बीएनपी सरकार चीन के साथ मजबूत आर्थिक सहयोग जारी रख सकती है, क्योंकि चीन बांग्लादेश में अवसंरचना निवेश का एक प्रमुख भागीदार है। पाकिस्तान के साथ भी संबंधों को संतुलित बनाए रखने की संभावना जताई जा रही है। इससे दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय समीकरणों में नया संतुलन उभर सकता है।
एक अन्य संवेदनशील मुद्दा शेख हसीना की भारत में उपस्थिति है, जिसे बीएनपी के कुछ नेता जनभावनाओं से जोड़कर देखते हैं। प्रत्यर्पण का प्रश्न कानूनी और कूटनीतिक दृष्टि से जटिल है, इसलिए भारत को अपने रणनीतिक हितों और बांग्लादेश की बदलती विदेश नीति प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो भारत की सबसे लंबी स्थलीय सीमा है।
* तीस्ता नदी के जल बंटवारे का मुद्दा अभी तक दोनों देशों के बीच पूर्णतः सुलझा नहीं है।
* बांग्लादेश का गठन 1971 में मुक्ति संग्राम के बाद हुआ, जिसमें भारत ने सैन्य समर्थन प्रदान किया था।
* श्रम, व्यापार और पारगमन कनेक्टिविटी भारत-बांग्लादेश संबंधों के प्रमुख स्तंभ हैं।
बांग्लादेश में बीएनपी की संभावित सरकार दक्षिण एशिया की राजनीति में नई दिशा निर्धारित कर सकती है। भारत के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों है—जहाँ उसे अपने सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए एक स्थिर और सहयोगी पड़ोसी संबंध बनाए रखने की आवश्यकता होगी।