फारस की खाड़ी में जीपीएस स्पूफिंग से बढ़ा विमानन सुरक्षा खतरा
फारस की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब नागरिक विमानन पर भी दिखाई देने लगा है। हाल के दिनों में इस क्षेत्र में उड़ान भरने वाले कई वाणिज्यिक विमानों को जीपीएस स्पूफिंग की घटनाओं का सामना करना पड़ा है। इसमें विमान के नेविगेशन सिस्टम को नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजकर भ्रमित किया जाता है, जिससे कॉकपिट में विमान की गलत स्थिति दिखाई देने लगती है। इस नई चुनौती ने वैश्विक विमानन प्राधिकरणों और एयरलाइनों के सामने गंभीर सुरक्षा चिंताएँ खड़ी कर दी हैं।
जीपीएस स्पूफिंग क्या है और कैसे काम करता है
जीपीएस स्पूफिंग एक उन्नत इलेक्ट्रॉनिक हमला है जिसमें असली सैटेलाइट सिग्नलों की जगह नकली संकेत प्रसारित किए जाते हैं। इन नकली संकेतों को विमान के नेविगेशन रिसीवर असली समझ लेते हैं और पायलट के सामने गलत स्थान की जानकारी प्रदर्शित होने लगती है।
यह तकनीक सामान्य सिग्नल जैमिंग से अलग है। जैमिंग में सिग्नल को बाधित कर दिया जाता है, जबकि स्पूफिंग में गलत जानकारी दी जाती है। उदाहरण के तौर पर हाल की घटनाओं में कुछ विमानों के नेविगेशन सिस्टम ने दिखाया कि वे ईरान के हवाई क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं, जबकि वास्तविकता में वे अंतरराष्ट्रीय उड़ान मार्ग पर ही उड़ रहे थे।
वाणिज्यिक विमानन के लिए बढ़ता खतरा
आधुनिक यात्री विमान जीपीएस आधारित नेविगेशन पर काफी हद तक निर्भर होते हैं। उड़ान मार्ग तय करने, ईंधन की बचत करने और सटीक लैंडिंग प्रक्रिया में जीपीएस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि पायलट अनजाने में गलत सिग्नल का पालन करने लगें, तो विमान गलती से प्रतिबंधित या सैन्य हवाई क्षेत्र के करीब पहुंच सकता है। तनावपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल में ऐसी स्थिति किसी सैन्य प्रतिक्रिया को भी जन्म दे सकती है। इसी वजह से कई अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों ने फारस की खाड़ी क्षेत्र में अपने उड़ान मार्ग बदल दिए हैं, जिससे यात्रा समय और ईंधन की खपत दोनों बढ़ गई हैं।
फारस की खाड़ी में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली
फारस की खाड़ी दुनिया के सबसे संवेदनशील सैन्य क्षेत्रों में से एक है। यहां कई देशों ने उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियाँ तैनात कर रखी हैं जो दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और संचार नेटवर्क को बाधित करने के लिए बनाई गई हैं।
हालांकि इन प्रणालियों का प्रभाव कभी-कभी नागरिक नेविगेशन प्रणालियों पर भी पड़ सकता है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार मार्च की शुरुआत से ही इस क्षेत्र में हजार से अधिक समुद्री जहाजों और सैकड़ों उड़ानों ने नेविगेशन संबंधी असामान्यताओं का अनुभव किया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जीपीएस का पूरा नाम ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम है, जो उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली है।
- इस प्रणाली का विकास मूल रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना ने किया था।
- इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में जैमिंग, स्पूफिंग और सिग्नल इंटरसेप्शन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
- फारस की खाड़ी यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाला अत्यंत व्यस्त अंतरराष्ट्रीय विमानन मार्ग माना जाता है।
वर्तमान परिस्थितियों में विमानन सुरक्षा एजेंसियां पायलटों के प्रशिक्षण पर विशेष जोर दे रही हैं। आधुनिक विमानों में एंटी-स्पूफिंग सॉफ्टवेयर विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन पारंपरिक नेविगेशन तकनीकों का महत्व भी बढ़ गया है। ग्राउंड-बेस्ड रेडियो बीकन, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और मानचित्र आधारित प्रक्रियाएं पायलटों को ऐसी परिस्थितियों में सही दिशा बनाए रखने में मदद करती हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकें विकसित हो रही हैं, वैसे-वैसे मानव कौशल और सतर्कता ही विमानन सुरक्षा की सबसे बड़ी ढाल बनकर सामने आ रही है।