प्रभास पाटन की शिलालेखीय विरासत: सोमनाथ मंदिर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेज
प्रभास पाटन भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का एक जीवंत संग्रहालय है, जहां शिलालेख, ताम्रपत्र और स्मृति-स्तंभ सदियों की भक्ति, प्रतिरोध और राजाश्रय की गाथा सुनाते हैं। विशेष रूप से सोमनाथ मंदिर से जुड़े शिलालेख इस क्षेत्र की समृद्धि और सनातन धर्म के केन्द्रीय स्थल के रूप में इसकी स्थायी भूमिका को दर्शाते हैं।
प्रभास पाटन का शिलालेखीय इतिहास
प्राचीन सूर्य मंदिर परिसर से संचालित प्रभास पाटन संग्रहालय में कई प्रमाणित शिलालेख और मंदिर अवशेष सुरक्षित हैं। ये वस्तुएं एक ओर जहां आध्यात्मिक भक्ति को दर्शाती हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी दिखाती हैं कि सोमनाथ मंदिर ने कैसे बार-बार के आक्रमणों का सामना कर अपना अस्तित्व बनाए रखा। इन शिलालेखों में एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण अभिलेख भद्रकाली लेन स्थित राम मंदिर के पास पुरानी भद्रकाली मंदिर की दीवार में अंकित है, जो सोमपुरा ब्राह्मण श्री दीपकभाई दवे के निवास पर स्थित है।
1169 ईस्वी का भद्रकाली शिलालेख
प्रभास पाटन संग्रहालय के क्यूरेटर श्री तेजल परमार के अनुसार, यह शिलालेख 1169 ईस्वी (वलभी संवत 850 और विक्रम संवत 1255) का है। गुजरात राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित यह शिलालेख परमारकालीन परम पाशुपताचार्य श्रीमान् भावबृहस्पति की प्रशस्ति है, जो अन्हिलवाड़ पाटन के सोलंकी शासक कुमारपाल के आध्यात्मिक गुरु थे। यह अभिलेख सोमनाथ मंदिर के प्राचीन काल से मध्यकाल तक के इतिहास का एक दुर्लभ और निरंतर विवरण प्रस्तुत करता है।
चार युगों में सोमनाथ का पुनर्निर्माण
शिलालेख में सोमनाथ महादेव के चारों युगों में पुनर्निर्माण की परंपरा का उल्लेख है:
- सत्य युग में चंद्र (सोम) द्वारा स्वर्ण मंदिर,
- त्रेता युग में रावण द्वारा रजत मंदिर,
- द्वापर युग में श्रीकृष्ण द्वारा काष्ठ मंदिर,
- और कलियुग में भीमदेव सोलंकी द्वारा भव्य पत्थर का मंदिर निर्मित किया गया।
इतिहास से प्रमाणित है कि बाद में कुमारपाल ने इसी पवित्र स्थल पर पांचवां मंदिर 1169 ईस्वी में बनवाया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- प्रभास पाटन सोमनाथ मंदिर परंपरा से निकटता से जुड़ा है।
- सोलंकी वंश ने गुजरात में मंदिर वास्तुकला और साहित्य को बढ़ावा दिया।
- वलभी संवत और विक्रम संवत ऐतिहासिक भारतीय पंचांग प्रणालियाँ थीं।
- सोमनाथ मंदिर का चार युगों में पुनर्निर्माण पौराणिक परंपरा से जुड़ा है।
सोलंकी शासन और गुजरात का स्वर्ण युग
सोलंकी वंश के शासनकाल में प्रभास पाटन धर्म, वास्तुकला और साहित्य का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। सिद्धराज जयसिंह की न्यायप्रिय शासन व्यवस्था और कुमारपाल की भक्ति भावना ने सोमनाथ को गुजरात की सांस्कृतिक पहचान का गौरवमयी प्रतीक बना दिया। भद्रकाली शिलालेख उस काल की विद्वता, आस्था और परंपरा का साक्षी है, जो आज भी प्रभास पाटन को एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
यह ऐतिहासिक विरासत भारत के सनातन धर्म, आत्मबल और सांस्कृतिक गौरव को निरंतर प्रेरणा देती है।