प्रख्यात समाजशास्त्री आंद्रे बेतेयी का निधन: जाति, असमानता और लोकतंत्र पर विमर्श की एक युगांतकारी विराम
भारत के अग्रणी समाजशास्त्री और सार्वजनिक बौद्धिक व्यक्तित्व आंद्रे बेतेयी (Andre Beteille) का 91 वर्ष की आयु में दिल्ली में निधन हो गया। वे लंबे समय से उम्रजनित स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे और मंगलवार रात को उन्होंने शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय समाजशास्त्र के एक महत्वपूर्ण युग का अंत हो गया, जिसने छह दशकों तक जाति, सामाजिक असमानता और उदार लोकतंत्र पर अकादमिक और सार्वजनिक विमर्श को दिशा दी।
दीर्घकालीन अस्वस्थता के बाद निधन
उनकी बेटी राधा बेतेयी ने प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया को उनके निधन की पुष्टि की। बुधवार को दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार उनके परिजनों और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े करीबी सहयोगियों की उपस्थिति में संपन्न हुआ।
अकादमिक जीवन और बौद्धिक विरासत
आंद्रे बेतेयी 2003 से दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एमेरिटस के रूप में कार्यरत रहे। उनका जन्म पश्चिम बंगाल में हुआ था; उनके पिता फ्रांसीसी और माता भारतीय थीं। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कोलकाता विश्वविद्यालय से प्राप्त की और बाद में दिल्ली में समाजशास्त्र के क्षेत्र में प्रतिष्ठा अर्जित की।
उनकी शोध शैली में अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान और कानून के तत्वों को सम्मिलित करते हुए जाति, वर्ग और सामाजिक संरचना का गहन विश्लेषण देखने को मिलता है। उन्होंने तथ्यात्मक अनुसंधान और तुलनात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से भारतीय समाज की जटिलताओं को उजागर किया।
प्रमुख कृतियाँ और राष्ट्रीय सम्मान
आंद्रे बेतेयी की अनेक रचनाएँ समाजशास्त्र के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए आधारशिला मानी जाती हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में शामिल हैं:
- “Caste, Class and Power” – तमिलनाडु के एक गांव में किए गए फील्डवर्क पर आधारित
- “Society and Politics in India”
- “The Idea of Natural Inequality and Other Essays”
उनकी शैक्षणिक और साहित्यिक उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- आंद्रे बेतेयी भारतीय समाजशास्त्र के प्रमुख विद्वान थे, जिनका फोकस जाति और सामाजिक असमानता पर था।
- उन्होंने “Caste, Class and Power” जैसी क्लासिक कृति लिखी जो तमिलनाडु के फील्डवर्क पर आधारित थी।
- उन्हें 2005 में पद्म भूषण मिला।
- वे 2003 से दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एमेरिटस रहे।
अकादमिक और सार्वजनिक जीवन से श्रद्धांजलियाँ
प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने उन्हें “नैतिक और बौद्धिक मार्गदर्शक” बताया, जिनसे पीढ़ियों ने प्रेरणा पाई। अशोक विश्वविद्यालय, जहाँ उन्होंने 2014 से 2017 तक कुलाधिपति के रूप में सेवा दी, ने उन्हें शैक्षणिक मूल्य और विवेक का प्रतीक बताया। हैदराबाद विश्वविद्यालय सहित देश भर के शिक्षण संस्थानों ने एक ऐसे विद्वान के निधन पर शोक जताया, जिनकी उदारवाद, सांस्कृतिक बहुलता और संवैधानिक लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता ने भारतीय बौद्धिक जीवन को समृद्ध किया।
आंद्रे बेतेयी का योगदान न केवल शोध और शिक्षण में रहा, बल्कि वे जनतांत्रिक चेतना और सामाजिक न्याय के विचारों को विस्तार देने वाले एक सांस्कृतिक स्तंभ भी थे। उनका कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बना रहेगा।