पेनैयार नदी जल विवाद: सुप्रीम कोर्ट का ट्रिब्यूनल गठन का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से लंबित पेनैयार नदी जल विवाद के समाधान हेतु एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) गठित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश वर्षों से चले आ रहे इस अंतर-राज्यीय जल विवाद को सुलझाने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर ट्रिब्यूनल गठन की अधिसूचना जारी करे। अदालत ने टिप्पणी की कि अब और विलंब करने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि इस विवाद के समाधान हेतु वैधानिक तंत्र को सक्रिय करना आवश्यक है।
पेनैयार नदी विवाद की पृष्ठभूमि
इस मामले की शुरुआत 2018 में तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर एक याचिका से हुई थी, जिसमें कर्नाटक द्वारा पेनैयार नदी पर चेक डैम और जल मोड़ संरचनाएं बनाने को चुनौती दी गई थी। तमिलनाडु का कहना है कि इन अपस्ट्रीम निर्माणों से नदी के डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों, विशेष रूप से सूखे के समय, कृषि और पेयजल आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
कानूनी तर्क और संवैधानिक पहलू
तमिलनाडु ने दलील दी कि अंतर-राज्यीय नदियों का जल एक राष्ट्रीय संपत्ति है, जो संविधान द्वारा शासित है, और किसी भी राज्य को उस पर एकाधिकार नहीं हो सकता। राज्य ने यह भी कहा कि कर्नाटक की कार्रवाइयाँ अंतर-राज्यीय नदी सिद्धांतों का उल्लंघन हैं और इस मामले की सुनवाई इंटर-स्टेट रिवर वॉटर डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह मानते हुए कि विवाद के तकनीकी, कानूनी और न्यायसंगत पहलुओं की समीक्षा एक ट्रिब्यूनल द्वारा ही उचित रूप से की जा सकती है, ट्रिब्यूनल गठन का आदेश दिया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पेनैयार नदी एक अंतर-राज्यीय नदी है, जो कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बहती है।
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद Inter-State River Water Disputes Act, 1956 के तहत सुलझाए जाते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को जल विवाद ट्रिब्यूनल गठित करने का निर्देश दे सकता है।
- भारत में अंतर-राज्यीय नदियों का जल राष्ट्रीय संसाधन माना जाता है।
ट्रिब्यूनल गठन का महत्व
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से अब इस लंबे समय से लंबित विवाद की औपचारिक सुनवाई शुरू हो सकेगी। एक बार ट्रिब्यूनल गठित हो जाने के बाद, यह दोनों राज्यों के दावों की समीक्षा करेगा, हाइड्रोलॉजिकल डेटा का विश्लेषण करेगा और न्यायसंगत जल बंटवारे की व्यवस्था तय करेगा। हालांकि विस्तृत निर्णय अभी लंबित है, लेकिन यह आदेश यह दर्शाता है कि न्यायपालिका समयबद्ध और संस्थागत समाधान को प्राथमिकता देती है, विशेषकर जब बात राज्यों के बीच जल विवाद की हो।
यह निर्णय भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए कानूनी ढांचे की सशक्तता और संवैधानिक दृष्टिकोण की पुष्टि करता है।