पूर्वोत्तर में स्वदेशी बायोसर्फैक्टेंट का विकास, कॉस्मेटिक उद्योग को नई दिशा
भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अधीन पूर्वोत्तर भारत स्थित एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान ने प्राकृतिक पदार्थों से एक नवीन बायोसर्फैक्टेंट का संश्लेषण कर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। यह खोज सिंथेटिक सर्फैक्टेंट के विकल्प के रूप में उभर सकती है, जो वर्तमान में कॉस्मेटिक, औषधि और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। यह नया यौगिक विशेष रूप से त्वचा से जुड़े रोगजनकों के विरुद्ध प्रभावी जीवाणुरोधी और सफाई गुण प्रदर्शित करता है।
आईएएसएसटी की अभिनव पहल
यह शोध पूर्वोत्तर भारत के गुवाहाटी स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएएसएसटी) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। संस्थान के निदेशक प्रो. आशीष के. मुखर्जी के नेतृत्व में प्रो. एम. आर. खान और वरिष्ठ शोध फेलो अनुश्री रॉय ने इस परियोजना को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।
वैज्ञानिकों ने प्रोबायोटिक जीवाणु लैक्टोबैसिलस प्लांटारम जेबीसी5 का उपयोग कर इस बायोसर्फैक्टेंट का निर्माण किया। विशेष बात यह रही कि इसके उत्पादन में घी को मुख्य सब्सट्रेट के रूप में प्रयोग किया गया, जो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा एक पोषक तत्व है। सांख्यिकीय ‘रिस्पॉन्स सरफेस’ विश्लेषण के माध्यम से उत्पादन प्रक्रिया को अनुकूलित किया गया, जिससे उच्च दक्षता के साथ लिपोपेप्टाइड बायोसर्फैक्टेंट प्राप्त हुआ। यह पारंपरिक खाद्य-आधारित संसाधनों और आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
जीवाणुरोधी एवं सफाई गुणों की पुष्टि
प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया कि यह बायोसर्फैक्टेंट स्टैफिलोकोकस ऑरियस नामक जीवाणु के विरुद्ध प्रभावी है, जो सामान्यतः त्वचा और घाव संक्रमण का कारण बनता है। जब इसे व्यावसायिक फेस वॉश उत्पादों के साथ मिलाया गया, तो इसने दाग हटाने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई।
इस यौगिक ने खाद्य तेलों के लिए 60 प्रतिशत तक का इमल्सीफिकेशन इंडेक्स प्रदर्शित किया और सतही तनाव को कम करने की क्षमता भी पारंपरिक सर्फैक्टेंट के समान पाई गई। उल्लेखनीय है कि यह 276 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान और विभिन्न पीएच स्तरों पर स्थिर बना रहता है, जो इसकी औद्योगिक उपयोगिता को और बढ़ाता है।
जैव-आधारित विकल्पों की बढ़ती आवश्यकता
सर्फैक्टेंट का उपयोग इमल्सीफायर, डिस्पर्सेंट और स्नेहक के रूप में अनेक उद्योगों में होता है। हालांकि, सिंथेटिक सर्फैक्टेंट के उपयोग से विषाक्तता और पर्यावरण में कम जैव-अवक्रमणीयता जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। ऐसे में जैव-आधारित विकल्पों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हों। यह नवीन बायोसर्फैक्टेंट इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
- बायोसर्फैक्टेंट सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पादित सतह-सक्रिय पदार्थ होते हैं।
- स्टैफिलोकोकस ऑरियस त्वचा और घाव संक्रमण से जुड़ा प्रमुख जीवाणु है।
- लिपोपेप्टाइड ऐसे यौगिक होते हैं जिनमें लिपिड और पेप्टाइड दोनों घटक शामिल होते हैं।
वर्तमान में शोधकर्ता इस यौगिक की विषाक्तता जांच और खुराक मानकीकरण पर कार्य कर रहे हैं। साथ ही, उद्योगों के साथ सहयोग के माध्यम से इसके व्यावसायीकरण की दिशा में प्रयास जारी हैं। यदि इसे बड़े पैमाने पर सफलतापूर्वक अपनाया गया, तो यह कॉस्मेटिक, औषधि और उपभोक्ता उत्पाद उद्योगों में हानिकारक कृत्रिम सर्फैक्टेंट का सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकता है।