पूर्वोत्तर भारत में दुर्लभ कीलबैक सांपों की खोज
देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वैज्ञानिकों ने पूर्वोत्तर भारत में दो दुर्लभ कीलबैक सांप प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया है। इनमें रखाइन कीलबैक (Herpetoreas davidi) को मिजोरम के न्गेंगपुई वन्यजीव अभयारण्य में और काचिन हिल्स कीलबैक (Hebius gilhodesi) को अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान तथा कमलांग टाइगर रिजर्व में दर्ज किया गया। यह खोज क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और संरक्षण के महत्व को उजागर करती है।
कीलबैक सांपों के बारे में
कीलबैक सांप सामान्यतः गैर-विषैले (नॉन-वेनमस) होते हैं और विभिन्न प्रकार के आवासों में आसानी से अनुकूलित हो जाते हैं। ये प्रायः जल स्रोतों जैसे नदियों, झीलों, आर्द्रभूमियों और नम जंगलों के आसपास पाए जाते हैं। इनकी उपस्थिति गीले और शुष्क दोनों प्रकार के वन क्षेत्रों में देखी जाती है, जिससे ये पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते हैं।
विशिष्ट शारीरिक विशेषताएं
कीलबैक सांपों की सबसे खास पहचान उनकी ‘कील्ड स्केल्स’ होती हैं। प्रत्येक स्केल के बीच में एक उभरी हुई रेखा होती है, जिससे उनकी त्वचा खुरदरी दिखाई देती है। यह विशेषता उन्हें प्राकृतिक परिवेश में छिपने में मदद करती है, क्योंकि यह प्रकाश के प्रतिबिंब को तोड़ देती है और उन्हें पत्तियों, मिट्टी और दलदली क्षेत्रों में आसानी से घुलने-मिलने देती है।
आहार और व्यवहार
कीलबैक सांप मांसाहारी होते हैं और मुख्य रूप से मेंढक, छिपकली, मछली और टैडपोल जैसे छोटे जीवों का शिकार करते हैं। इनका जीवन जल और अर्ध-जलीय पारिस्थितिकी तंत्र से गहराई से जुड़ा होता है। ये सांप सामान्यतः उन क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं जहां पर्याप्त नमी और भोजन उपलब्ध होता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- कीलबैक सांप सामान्यतः गैर-विषैले होते हैं।
- इनकी पहचान ‘कील्ड स्केल्स’ यानी उभरी हुई रेखाओं वाले स्केल्स से होती है।
- ये आर्द्रभूमि, जल स्रोतों और जंगलों में पाए जाते हैं।
- इनकी उपस्थिति स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत मानी जाती है।
पारिस्थितिक महत्व
कीलबैक सांप पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण संकेतक (इकोलॉजिकल इंडिकेटर) हैं, जो जंगल और जल स्रोतों के स्वास्थ्य को दर्शाते हैं। पूर्वोत्तर भारत के संरक्षित क्षेत्रों में इन दुर्लभ प्रजातियों की खोज यह दर्शाती है कि यह क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अंततः, इस तरह की खोजें न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह हमें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता की भी याद दिलाती हैं।