पूर्वी हिमालय में डिप्लूरा की नई प्रजाति ‘लेपिडोकैम्पा सिक्किमेन्सिस’ की खोज

पूर्वी हिमालय में डिप्लूरा की नई प्रजाति ‘लेपिडोकैम्पा सिक्किमेन्सिस’ की खोज

भारत में कीट विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई है। भारतीय प्राणि सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने पूर्वी हिमालय क्षेत्र में डिप्लूरा की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम ‘लेपिडोकैम्पा सिक्किमेन्सिस’ रखा गया है। यह खोज लगभग पांच दशकों के बाद भारत में डिप्लूरा पर हुए सीमित शोध को नई दिशा देती है और पहली बार किसी भारतीय शोध दल द्वारा इस समूह की प्रजाति का औपचारिक वर्णन किया गया है। यह शोध 7 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय वर्गिकी पत्रिका ‘ज़ूटैक्सा’ में प्रकाशित हुआ।

प्राचीन हेक्सापोड वंश से संबंध

डिप्लूरा आदिम हेक्सापोड्स का हिस्सा हैं, जो छह पैरों वाले आर्थ्रोपोड्स के समूह में आते हैं। ये अंधे, पंखहीन और मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीव होते हैं, जिन्हें सामान्यतः दो-प्रोंग्ड ब्रिसलटेल्स कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘लेपिडोकैम्पा सिक्किमेन्सिस’ हेक्सापोड्स की एक प्राचीन विकासवादी वंशावली से संबंधित है।

अब तक भारत में डिप्लूरा की 17 प्रजातियां दर्ज की जा चुकी थीं, लेकिन इन सभी की पहचान विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा की गई थी। ऐसे में यह नई खोज स्वदेशी वर्गिकी अनुसंधान के पुनरुत्थान का संकेत देती है और भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमता को दर्शाती है।

पूर्वी हिमालय में खोज और पहचान

शोध दल ने सिक्किम के रावांगला क्षेत्र के पास नमूनों को एकत्रित किया। बाद में इस प्रजाति की उपस्थिति पश्चिम बंगाल के कुर्सियांग में भी पाई गई, जिससे संकेत मिलता है कि इसका वितरण पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में व्यापक हो सकता है।

इस नई प्रजाति की पहचान उसके शरीर पर मौजूद विशिष्ट स्केल संरचना, विशेष कीटोसेटैक्सी पैटर्न तथा अनूठी उपांग संरचनाओं के आधार पर की गई। इन रूपात्मक विशेषताओं ने इसे अन्य ज्ञात प्रजातियों से अलग स्थापित किया। अध्ययन के दौरान लगभग 50 वर्षों से अनुपस्थित एक दुर्लभ उपप्रजाति ‘लेपिडोकैम्पा जुरादी बंगालेन्सिस’ का पुनः अभिलेखन भी किया गया।

पारिस्थितिक और वैज्ञानिक महत्व

मिट्टी में रहने वाले ऐसे सूक्ष्म जीव पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। डिप्लूरा पोषक तत्वों के चक्रण और मिट्टी की संरचना को बनाए रखने में योगदान देते हैं, जिससे स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित रहता है।

इस अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि पहली बार किसी भारतीय ‘लेपिडोकैम्पा’ प्रजाति के लिए डीएनए बारकोड डेटा तैयार किया गया। इससे पारंपरिक रूपात्मक वर्गिकी को आधुनिक आणविक तकनीकों के साथ जोड़ा गया, जो भविष्य के शोध के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

* हेक्सापोडा छह पैरों वाले आर्थ्रोपोड्स का समूह है, जिसमें कीट और उनसे संबंधित जीव शामिल हैं।
* डिप्लूरा अंधे, पंखहीन और मिट्टी में रहने वाले आदिम हेक्सापोड्स होते हैं, जिनकी पूंछ दो भागों में विभाजित होती है।
* पूर्वी हिमालय विश्व के प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक माना जाता है।
* डीएनए बारकोडिंग तकनीक के माध्यम से प्रजातियों की पहचान उनके आनुवंशिक अनुक्रम के आधार पर की जाती है।

‘लेपिडोकैम्पा सिक्किमेन्सिस’ की खोज न केवल भारत के मृदा जैव-विविधता अभिलेख को सुदृढ़ करती है, बल्कि यह दर्शाती है कि कम ज्ञात जीव समूहों पर सतत शोध कितना आवश्यक है। क्षेत्रीय सर्वेक्षण और आधुनिक आणविक तकनीकों के संयोजन से यह अध्ययन हिमालयी क्षेत्र में जैव-विविधता प्रलेखन और कीट वर्गिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ है।

Originally written on February 18, 2026 and last modified on February 18, 2026.

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