पुरी बना भारत का पहला शहर जहाँ नल का पानी सीधे पीने योग्य
ओडिशा का तीर्थनगरी पुरी अब भारत का पहला ऐसा शहर बन गया है जहाँ नागरिक बिना किसी शुद्धिकरण उपकरण के सीधे नल से पानी पी सकते हैं। यह एक दुर्लभ सार्वजनिक स्वास्थ्य उपलब्धि है, जो देश के अधिकांश शहरों में व्याप्त असुरक्षित पेयजल संकट के विपरीत एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरी है। पुरी की इस सफलता ने घरेलू वाटर प्यूरीफायर्स पर निर्भरता को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है — क्या यह प्रगति का प्रतीक है या एक प्रणालीगत विफलता?
कैसे संभव हुआ पुरी में शुद्ध नल का पानी
पुरी में नल का पानी भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरता है, जिससे यह सीधे पीने योग्य प्रमाणित हो चुका है। इसकी नींव पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक द्वारा 2021 में शुरू की गई ‘सुझल — ड्रिंक फ्रॉम टैप मिशन’ के तहत रखी गई थी, जिसे केंद्र सरकार की AMRUT योजना के साथ समन्वयित किया गया था।
ओडिशा सरकार ने इस पहल की शुरुआत 2017 में पायलट परियोजना के रूप में की थी, जिससे यह देश का पहला राज्य बन गया जिसने घरों में नल से पीने योग्य पानी की गारंटी दी। 2025 तक, लगभग तीन लाख की आबादी वाले पुरी शहर में 24×7 शुद्ध पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित कर दी गई।
तकनीकी, निगरानी और सामुदायिक सहभागिता
पुरी में जल शुद्धता को सुनिश्चित करने के लिए बहु-स्तरीय जल शोधन प्रक्रियाएं अपनाई गई हैं, जिनमें तलछट निष्कासन (sedimentation), निस्पंदन (filtration), ओज़ोनेशन (ozonation) और क्लोरीनीकरण (chlorination) शामिल हैं। पूरे शहर में उच्च दबाव वाली पाइपलाइन प्रणाली और सेंसर आधारित रीयल टाइम मॉनिटरिंग के माध्यम से जल की गुणवत्ता की सतत निगरानी की जाती है।
लगभग 80–85% घरों में वॉटर मीटर लगाए गए हैं, जिससे जल उपभोग और बर्बादी पर नियंत्रण रखा जा सके। इस कार्यक्रम में सामुदायिक सहभागिता भी जोड़ी गई है — ‘जल साथी’ नामक प्रशिक्षित महिला कार्यकर्ताओं को फील्ड निरीक्षण और जल परीक्षण की जिम्मेदारी दी गई है, जिससे जमीनी स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पुरी भारत का पहला शहर बना है जहाँ 24×7 पीने योग्य नल का पानी उपलब्ध है।
- ‘सुझल — ड्रिंक फ्रॉम टैप मिशन’ की शुरुआत ओडिशा सरकार ने 2021 में की थी।
- AMRUT (Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation) योजना का उद्देश्य शहरी जलापूर्ति और स्वच्छता ढांचे को सुदृढ़ करना है।
- भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) देश में पेयजल की गुणवत्ता के मानक तय करता है।
घरेलू जल शुद्धिकरण प्रणाली क्यों दर्शाती है प्रणालीगत विफलता
भारत में बढ़ती हुई घरेलू वाटर प्यूरीफायर की मांग को अक्सर आर्थिक प्रगति के रूप में देखा जाता है, जबकि यह वास्तव में सार्वजनिक जल आपूर्ति की विफलता का संकेत है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री फ्रेडरिक बस्तियात के “ब्रोकन विंडो फालसी” के अनुसार, ऐसे खर्च उस मूल समस्या का समाधान नहीं करते, बल्कि केवल उसकी भरपाई करते हैं।
नीति आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, प्यूरीफायर उद्योग का बढ़ना सार्वजनिक जल प्रणाली में अपर्याप्त निवेश का दुष्परिणाम है। सुसंस्कृत अर्थव्यवस्थाओं में, सुरक्षित नल का पानी एक सार्वजनिक गारंटी होती है, न कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी।
वैश्विक प्रेरणा: अमेरिका और यूरोप से सीख
संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में शहरी जल संकट का समाधान 19वीं और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में ही हो चुका था। अमेरिका ने 1900 के दशक में घातक हैजा और टायफाइड की महामारियों के बाद जल निस्पंदन और क्लोरीनीकरण अपनाया, जबकि यूरोप ने ‘ग्रेट स्टिंक’ जैसी घटनाओं के बाद सीवेज और जल आपूर्ति प्रणाली को अलग कर दिया।
कड़े कानून, उच्च निवेश और कड़ी निगरानी ने यह सुनिश्चित किया कि नल का पानी सुरक्षित हो और नागरिकों को घरेलू उपायों पर निर्भर न रहना पड़े।
पुरी की सफलता दिखाती है कि सार्वजनिक प्रणाली में सुधार ही सच्ची प्रगति का प्रतीक है, और इसकी मिसाल अन्य भारतीय शहरों के लिए मार्गदर्शक बन सकती है।