पद्म भूषण से सम्मानित शिबू सोरेन: झारखंड आंदोलन और जनजातीय अधिकारों के पुरोधा
झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और वयोवृद्ध जनजातीय नेता शिबू सोरेन को सार्वजनिक जीवन में उनके ऐतिहासिक योगदान के लिए वर्ष 2026 का पद्म भूषण मरणोपरांत प्रदान किया गया है। यह सम्मान गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा घोषित किया गया, जो दशकों तक चले उनके संघर्ष, विशेषकर झारखंड राज्य की स्थापना और जनजातीय सशक्तिकरण में उनके नेतृत्व को मान्यता देता है। हालांकि इस सम्मान ने उनके लिए भारत रत्न की मांग को भी नई गति दे दी है।
प्रारंभिक जीवन और संघर्षों की शुरुआत
11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का राजनीतिक चेतना एक व्यक्तिगत त्रासदी से प्रेरित हुई। जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब महाजनों द्वारा उनके पिता की हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने उन्हें आजीवन “महाजनी प्रथा” के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे वे भूमि अधिकार, जनजातीय न्याय और सामाजिक समता के लिए एक प्रभावशाली आवाज बन गए और उन्हें उनके अनुयायियों द्वारा ‘दिशोम गुरु’ (धरती के नेता) की उपाधि दी गई।
झारखंड आंदोलन और शासन में भूमिका
शिबू सोरेन झारखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख शिल्पकारों में से एक रहे। उन्होंने जनजातीय समुदायों को एकजुट कर दशकों तक पृथक राज्य की मांग को जीवित रखा, जो अंततः वर्ष 2000 में झारखंड की स्थापना के रूप में साकार हुई। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और आठ बार दुमका संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। उनका राजनीतिक जीवन जन आंदोलन और संसदीय राजनीति का अद्भुत संयोजन रहा, जिससे वे स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली जनजातीय नेताओं में गिने जाते हैं।
पद्म भूषण पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
जहाँ झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पद्म भूषण को स्वागत योग्य बताया, वहीं इसे शिबू सोरेन के योगदान की “पूर्ण मान्यता” न मानते हुए भारत रत्न की मांग दोहराई। कांग्रेस ने भी इसी मांग का समर्थन किया। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी ने इस सम्मान को झारखंड की मिट्टी, संघर्ष और जनआंदोलन को समर्पित बताया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पद्म भूषण भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है।
- शिबू सोरेन झारखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख नेता थे।
- वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
- ‘दिशोम गुरु’ का अर्थ है जनजातीय समुदायों में ‘धरती का नेता’।
विरासत और जारी बहस
अगस्त 2025 में लंबी बीमारी के बाद 81 वर्ष की आयु में शिबू सोरेन का निधन हो गया। उनके समर्थकों के लिए पद्म भूषण, जनजातीय संघर्षों की राष्ट्रीय मान्यता है, लेकिन भारत रत्न की मांग उनके प्रतीकात्मक महत्व को रेखांकित करती है। यह बहस दर्शाती है कि शिबू सोरेन की राजनीतिक और सामाजिक विरासत आज भी झारखंड और भारत की राजनीति को प्रभावित करती है। उनकी भूमिका न केवल अतीत की उपलब्धि है, बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनी हुई है।