पद्मश्री 2026: मध्य प्रदेश के चार सपूतों को मिला जमीनी योगदान का राष्ट्रीय सम्मान

पद्मश्री 2026: मध्य प्रदेश के चार सपूतों को मिला जमीनी योगदान का राष्ट्रीय सम्मान

पद्म पुरस्कार 2026 में मध्य प्रदेश के चार ऐसे व्यक्तियों को पद्मश्री से नवाज़ा गया है, जिनका कार्य प्रायः मीडिया की नज़रों से दूर रहा, परंतु समाज और संस्कृति पर उनका प्रभाव गहरा और स्थायी रहा। इनका योगदान साहित्य, सामाजिक सेवा, पुरातत्व और पारंपरिक युद्धकला जैसे विविध क्षेत्रों में फैला है, जो यह सिद्ध करता है कि राष्ट्र निर्माण केवल चर्चित मंचों पर नहीं, बल्कि सतत श्रम और प्रतिबद्धता से होता है।

जमीनी स्तर की उत्कृष्टता को पहचान

इस वर्ष घोषित 131 पद्म पुरस्कारों में मध्य प्रदेश के चार पद्मश्री पुरस्कार विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं। ये सम्मान उन व्यक्तियों को दिए गए हैं जिन्होंने महानगरों से दूर रहकर, समुदायों के बीच रहकर कार्य किया। यह दर्शाता है कि पद्म पुरस्कार अब केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक योगदान का भी सम्मान करते हैं।

कैलाश चंद्र पंत: हिंदी विचारधारा के सजग प्रहरी

भोपाल निवासी कैलाश चंद्र पंत को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपनी युवावस्था में सुधारवादी विचारधारा से प्रेरित होकर पत्रकारिता को जीवन का मिशन बनाया। सरकारी नौकरी के विकल्प को ठुकराकर उन्होंने 22 वर्षों तक हिंदी साप्ताहिक ‘जनधर्म’ का संपादन किया, जिसने आधुनिक हिंदी पत्रकारिता और बौद्धिक विमर्श को नई दिशा दी। यह पुरस्कार उनके किसी एक रचनात्मक कार्य का नहीं, बल्कि जीवनपर्यंत वैचारिक साधना का सम्मान है।

मोहान नगर: ‘जल पुरुष’ के रूप में पर्यावरण का प्रहरी

मोहान नगर, जिन्हें ‘बैतूल के जल पुरुष’ के नाम से जाना जाता है, को सामाजिक सेवा और पर्यावरणीय कार्यों के लिए पद्मश्री मिला। उन्होंने वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और गंगा अवतरण अभियान जैसे प्रयासों के माध्यम से ग्रामीण और आदिवासी समुदायों को जल संरक्षण के लिए संगठित किया। उनके कार्यों से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल स्रोत पुनर्जीवित हुए और जनसहभागिता आधारित पर्यावरणीय शासन को बल मिला।

डॉ. नारायण व्यास: पुरातत्व में समर्पित जीवन

डॉ. नारायण व्यास को पुरातत्व के क्षेत्र में चार दशकों के योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने कई महत्वपूर्ण स्थलों की खुदाई और संरक्षण का कार्य किया और विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने 10 पुस्तकें लिखकर युवाओं को पुरातत्व के प्रति जागरूक किया। उन्होंने यह सम्मान अपने गुरु डॉ. विष्णुधर वाकणकर को समर्पित कर शैक्षणिक परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा का गौरव बढ़ाया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • पद्मश्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
  • पद्म पुरस्कार विविध क्षेत्रों में सतत सार्वजनिक सेवा को मान्यता देते हैं।
  • सामुदायिक जल संरक्षण भारत की पर्यावरण नीति का प्रमुख अंग है।
  • देशी खेल और पारंपरिक युद्धकलाएँ भी पद्म पुरस्कारों के दायरे में शामिल होती हैं।

भगवंदास रैकवार: बुंदेली युद्धकला के पुनर्जीवक

सागर के ऐतिहासिक छत्रसाल बुंदेला अखाड़ा में भगवंदास रैकवार ने उस समय बुंदेली युद्धकला को पुनर्जीवित किया, जब यह परंपरा विलुप्ति के कगार पर थी। उन्होंने न केवल स्वयं इस कला का अभ्यास जारी रखा, बल्कि युवाओं को प्रशिक्षण देकर इसे जीवित रखा। उन्होंने रूस, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों में इस कला का प्रदर्शन कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देशी युद्धकला की पहचान बनाई।

उनका पद्मश्री सम्मान इस बात का संकेत है कि पारंपरिक कलाओं और युद्धकला को अब राष्ट्रीय खेलों की मान्यता की दिशा में ले जाने की आवश्यकता है।

इन चार व्यक्तियों की यात्राएं हमें यह सिखाती हैं कि असली परिवर्तन मंचों और मीडिया से नहीं, बल्कि नींव में रचे-बसे मौन कर्मों से आता है—जहाँ परिश्रम, निष्ठा और समाज के प्रति प्रतिबद्धता ही सबसे बड़ा पुरस्कार होती है।

Originally written on January 27, 2026 and last modified on January 27, 2026.

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