पद्मश्री सम्मानित के. पजनिवेल: सिलंबम को वैश्विक पहचान दिलाने वाले योद्धा
तमिलनाडु की पारंपरिक युद्धकला “सिलंबम” को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले पुडुचेरी के के. पजनिवेल को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत साधना को मान्यता देता है, बल्कि भारत की पारंपरिक ज्ञान परंपराओं को संरक्षित करने के सामूहिक प्रयासों को भी उजागर करता है।
प्रारंभिक जीवन और सिलंबम से जुड़ाव
30 जनवरी 1973 को पुडुचेरी के पूरणंकुप्पम में जन्मे के. पजनिवेल ने अपने गुरु मास्टर राजाराम से सिलंबम की प्रारंभिक शिक्षा ली। यह प्रशिक्षण मात्र एक कला सीखने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि अनुशासन, आत्मसंयम और संस्कृति के प्रति समर्पण का प्रतीक बनी। वर्षों के अभ्यास और शोध के बाद पजनिवेल ने न केवल इस कला को आत्मसात किया, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का बीड़ा भी उठाया।
पारंपरिक तमिल युद्धकला का संरक्षण और प्रसार
एक प्रशिक्षक और प्रचारक के रूप में पजनिवेल ने सैकड़ों विद्यार्थियों को निःशुल्क प्रशिक्षण दिया है। उनके प्रयासों में केवल शारीरिक दक्षता नहीं, बल्कि सिलंबम से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान को भी संरक्षित करना शामिल है। उन्होंने भारत के विभिन्न भागों में और विदेशों में कार्यशालाओं, प्रदर्शनियों और प्रतियोगिताओं के माध्यम से सिलंबम को लोकप्रिय बनाने का कार्य किया है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान
पद्मश्री से पहले भी के. पजनिवेल को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया है, जिनमें शामिल हैं:
- 2023 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (मार्शल आर्ट्स के लिए)
- 2012 में कलैमामणि पुरस्कार (पुडुचेरी सरकार द्वारा)
- 2004 में बेस्ट यूथ अवार्ड (नेहरू युवा केंद्र द्वारा)
- 2002 में सिलंबम इंटरनेशनल अवार्ड
इन सभी सम्मानों से यह स्पष्ट होता है कि पजनिवेल का योगदान क्षणिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और निरंतर समर्पित रहा है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सिलंबम तमिलनाडु की पारंपरिक युद्धकला है जिसमें बांस की लाठी का प्रयोग किया जाता है।
- पद्मश्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदर्शन कलाओं में उत्कृष्टता के लिए दिया जाता है।
- कलैमामणि पुरस्कार पुडुचेरी सरकार द्वारा कला-संस्कृति में योगदान के लिए दिया जाता है।
भविष्य की दृष्टि: स्कूलों में सिलंबम और वैश्विक मंच पर विस्तार
पद्मश्री सम्मान के बाद आकाशवाणी से बातचीत में पजनिवेल ने कहा कि यह पुरस्कार उनके प्रयासों को नई ऊर्जा देता है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से अनुरोध किया कि सिलंबम को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, ताकि यह कला सिर्फ मंचों तक सीमित न रहे, बल्कि जन-जन तक पहुँचे।
उनका सपना है कि सिलंबम को एक वैश्विक पहचान दिलाई जाए और इसे एक अनुशासित शारीरिक अभ्यास तथा सांस्कृतिक धरोहर दोनों रूपों में नई पीढ़ी को सौंपा जाए।
के. पजनिवेल की साधना, शिक्षा और समर्पण यह सिद्ध करता है कि भारत की पारंपरिक कलाएं अभी भी जीवंत हैं—बस उन्हें संरक्षण, प्रचार और समर्थन की आवश्यकता है।