नागालैंड में ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों से दो नई मछली प्रजातियों की खोज
पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता को उजागर करते हुए वैज्ञानिकों ने नागालैंड से दो नई मीठे पानी की मछली प्रजातियों की पहचान की है। यह खोज अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका “जूटैक्सा” में प्रकाशित हुई है। इन प्रजातियों की खोज भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–केंद्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ता जे. प्रवीनराज और स्वतंत्र शोधकर्ता बालाजी विजयकृष्णन ने की। ये मछलियाँ नागालैंड के मोकोकचुंग जिले में ब्रह्मपुत्र नदी की सहायक नदियों में किए गए इच्थियोलॉजिकल सर्वेक्षण के दौरान पाई गईं। यह खोज पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध लेकिन अभी भी कम खोजी गई जलीय जैव विविधता की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
दिवंगत सहयोगी के बच्चों के नाम पर प्रजातियों का नामकरण
नई खोजी गई प्रजातियों के नाम “ग्लिप्टोथोरैक्स सेंटिमेरेनी” और “ओरिख्थीस एलियाने” रखे गए हैं। इनका नाम नागालैंड के दिवंगत सहायक प्रोफेसर लिमाकुम के बेटे और बेटी के नाम पर रखा गया है। लिमाकुम इस शोध कार्य में वैज्ञानिकों के करीबी सहयोगी थे और उनकी अंतिम इच्छा थी कि किसी नई प्रजाति का नाम उनके बच्चों के नाम पर रखा जाए।
वैज्ञानिकों ने इस नामकरण के माध्यम से न केवल उनके वैज्ञानिक योगदान को सम्मान दिया बल्कि शोध के दौरान बने मानवीय संबंधों को भी श्रद्धांजलि दी। यह वैज्ञानिक समुदाय में सहयोग और सम्मान की भावना का प्रतीक माना जा रहा है।
ग्लिप्टोथोरैक्स सेंटिमेरेनी की विशेषताएँ
“ग्लिप्टोथोरैक्स सेंटिमेरेनी” प्रजाति डिखू नदी के चट्टानी हिस्सों में पाई गई है। यह प्रजाति उन कैटफिश समूहों में शामिल है जो तेज बहाव वाली पहाड़ी नदियों में रहने के लिए अनुकूलित होती हैं। इस मछली के शरीर में एक विशेष प्रकार का हीरे के आकार का चिपकने वाला थोरासिक उपकरण होता है, जिसके चारों ओर केराटिनयुक्त उभार होते हैं।
यह संरचना मछली को तेज धाराओं में भी चट्टानों से मजबूती से चिपके रहने में मदद करती है। इसके अलावा इसके पृष्ठीय पंख की रीढ़ पर दांतेदार संरचना और पेक्टोरल तथा पेल्विक पंखों की मुड़ी हुई सतहें इसे गंगा–ब्रह्मपुत्र–मेघना नदी तंत्र की अन्य प्रजातियों से अलग बनाती हैं।
ओरिख्थीस एलियाने की पहचान
दूसरी नई प्रजाति “ओरिख्थीस एलियाने” त्सुरांग नदी की एक सहायक धारा में पाई गई है। यह एक छोटी साइप्रिनिड मछली है जिसकी लंबाई लगभग 2.5 सेंटीमीटर से थोड़ी अधिक होती है। इसकी सबसे प्रमुख पहचान इसके चमकीले लाल पंख और पूंछ के आधार के पास मौजूद काला धब्बा है।
इस मछली में अधूरी लैटरल लाइन होती है जिसमें केवल पाँच छिद्रयुक्त स्केल पाए जाते हैं। इसके गालों पर मौजूद विशिष्ट छिद्र भी इसे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाने वाली समान प्रजातियों से अलग पहचान देते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- नागालैंड पूर्वी हिमालय और इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट के संगम क्षेत्र में स्थित है।
- ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली पूर्वोत्तर भारत में मीठे पानी की अनेक मछली प्रजातियों का प्रमुख आवास है।
- “ग्लिप्टोथोरैक्स” जीनस में ऐसी कैटफिश शामिल होती हैं जो तेज बहाव वाली पर्वतीय नदियों में रहने के लिए अनुकूलित होती हैं।
- “जूटैक्सा” एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका है जो पशु वर्गीकरण और नई प्रजातियों के वैज्ञानिक वर्णन पर केंद्रित है।
नागालैंड से इन दो नई मछली प्रजातियों की खोज पूर्वोत्तर भारत के मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र की वैज्ञानिक समझ को और गहरा बनाती है। यह खोज इस बात को भी रेखांकित करती है कि ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में अभी भी कई अज्ञात प्रजातियाँ मौजूद हो सकती हैं। इसलिए इस क्षेत्र में निरंतर शोध और संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता है, ताकि इस अनमोल जैव विविधता को संरक्षित किया जा सके।