नागालैंड में पैंगोलिन संरक्षण को संगतम समुदाय का ऐतिहासिक संकल्प

नागालैंड में पैंगोलिन संरक्षण को संगतम समुदाय का ऐतिहासिक संकल्प

नागालैंड के संगतम समुदाय की सर्वोच्च संस्था ने अपने अधिकार क्षेत्र में पैंगोलिन की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया है। यह कदम भारत–म्यांमार सीमा क्षेत्र में वन्यजीव तस्करी पर अंकुश लगाने की दिशा में एक बड़ी पहल माना जा रहा है। किफिरे और तुएनसांग जिले, जो म्यांमार सीमा के निकट स्थित हैं, अवैध वन्यजीव व्यापार के प्रमुख ट्रांजिट मार्ग माने जाते रहे हैं। पैंगोलिन दुनिया के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले जंगली स्तनधारी हैं, जिनकी मांग मुख्यतः उनकी शल्क (स्केल्स) और मांस के लिए होती है।

यह प्रस्ताव यूनाइटेड संगतम लिखुम पुमजी द्वारा पारित किया गया, जो संगतम जनजाति की शीर्ष संस्था है। संरक्षण विशेषज्ञों ने इसे पैंगोलिन तस्करी रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठनों द्वारा चलाए जा रहे प्रयासों के अंतर्गत सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय प्रशासन के समन्वय पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

यह पहल सामुदायिक सहभागिता आधारित संरक्षण मॉडल को मजबूत करती है, जिसमें पारंपरिक जनजातीय संस्थाएं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। स्थानीय स्तर पर नियमों का पालन सुनिश्चित करना और जागरूकता बढ़ाना तस्करी पर रोक लगाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

संगतम बहुल क्षेत्र भारत–म्यांमार जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है। यह क्षेत्र घने जंगलों, झूम खेती और समृद्ध वन्यजीव विविधता के लिए जाना जाता है। यही जैविक संपन्नता इसे तस्करी नेटवर्क के लिए संवेदनशील भी बनाती है। 1,643 किलोमीटर लंबी भारत–म्यांमार सीमा हाल के वर्षों में पैंगोलिन तस्करी का प्रमुख मार्ग बनकर उभरी है।

पूर्वोत्तर भारत में पाए जाने वाले भारतीय पैंगोलिन और चीनी पैंगोलिन प्रजातियां विशेष रूप से खतरे में हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इनकी अवैध मांग के कारण इनकी संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में सीमा क्षेत्रों में सामुदायिक निगरानी और सख्त प्रवर्तन बेहद आवश्यक है।

इससे पहले मणिपुर के उखरुल जिले में तंगखुल नागा समुदाय द्वारा भी इसी प्रकार का संरक्षण संकल्प लिया गया था। नागालैंड की जनजातीय परिषदें और गांव स्तरीय संस्थाएं पारंपरिक शासन व्यवस्था के तहत प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को नियंत्रित करती हैं। इन संस्थाओं की भागीदारी संरक्षण को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाती है।

सामुदायिक स्वामित्व आधारित संरक्षण मॉडल दीर्घकालिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्थानीय परंपराओं और वैज्ञानिक रणनीतियों के समन्वय से वन्यजीव अपराधों पर प्रभावी रोक संभव है।

  • भारतीय पैंगोलिन और चीनी पैंगोलिन पूर्वोत्तर भारत में पाई जाने वाली प्रमुख प्रजातियां हैं।
  • पैंगोलिन विश्व के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले स्तनधारी जीव माने जाते हैं।
  • भारत–म्यांमार सीमा की लंबाई लगभग 1,643 किलोमीटर है।
  • भारत–म्यांमार क्षेत्र को वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता प्राप्त है।

संगतम समुदाय का यह निर्णय दर्शाता है कि वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पारंपरिक संस्थागत ढांचे और आधुनिक संरक्षण रणनीतियों के समन्वय से सीमा पार वन्यजीव अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। यह पहल पूर्वोत्तर भारत में पैंगोलिन संरक्षण को नई दिशा देने के साथ-साथ सतत विकास और जैव विविधता संरक्षण के प्रति बढ़ती जन-जागरूकता का संकेत भी देती है।

Originally written on February 14, 2026 and last modified on February 14, 2026.

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