देब्रीगढ़ में आयोजित होगा इंडियन बाइसन फेस्ट
ओडिशा के देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में 8 मार्च को दो दिवसीय ‘इंडियन बाइसन फेस्ट’ के दूसरे संस्करण का आयोजन किया जाएगा। हिराकुद वन्यजीव प्रभाग द्वारा आयोजित यह उत्सव भारतीय बाइसन यानी गौर के संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर इसे ‘गयाला’ के नाम से भी जाना जाता है। इस आयोजन में छात्र, शोधकर्ता, स्वयंसेवक और प्रकृति प्रेमी एक मंच पर आकर देब्रीगढ़–हिराकुद क्षेत्र में बढ़ती गौर आबादी का उत्सव मनाएंगे और संरक्षण के महत्व को समझेंगे।
दो दिवसीय कार्यक्रम में रोमांचक गतिविधियाँ
इस वर्ष के आयोजन को अधिक आकर्षक और अनुभवात्मक बनाने के लिए रात में कैंपिंग की व्यवस्था भी की गई है। कार्यक्रम की शुरुआत विशेषज्ञों के व्याख्यान से होगी, जिनमें गौर के व्यवहार, उनके आवासीय पारिस्थितिकी तंत्र और संरक्षण रणनीतियों पर चर्चा की जाएगी। इसके बाद वन्यजीवों से संबंधित फिल्मों का प्रदर्शन और गौर सफारी आयोजित की जाएगी, जिससे प्रतिभागी प्राकृतिक वातावरण में इन दुर्लभ जीवों को देखने का अनुभव प्राप्त कर सकेंगे।
शाम के समय तारामंडल अवलोकन सत्र आयोजित किया जाएगा, जहां प्रतिभागी खुले आसमान में सप्तऋषि मंडल और ओरायन जैसे तारामंडलों को देख सकेंगे। यह दृश्य हिराकुद आर्द्रभूमि और अभयारण्य के शांत वातावरण में विशेष आकर्षण का केंद्र होगा। दूसरे दिन ट्रेकिंग, क्रूज राइड और बैट आइलैंड की यात्रा जैसी गतिविधियाँ आयोजित होंगी, जहां 1000 से अधिक फल खाने वाले चमगादड़ों यानी फ्लाइंग फॉक्स को सुरक्षित दूरी से देखा जा सकेगा।
देब्रीगढ़ में बढ़ रही गौर की आबादी
यह उत्सव ऐसे समय आयोजित किया जा रहा है जब देब्रीगढ़ क्षेत्र में गौर की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। जनवरी में हुए नवीनतम गणना अभियान में कुल 848 गौर दर्ज किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 190 की वृद्धि दर्शाता है। इनमें से 235 गौर दो वर्ष से कम आयु के शावक हैं, जो कुल आबादी का लगभग 30 प्रतिशत हैं। यह आंकड़ा सफल प्रजनन और स्थिर झुंड संरचना की ओर संकेत करता है।
वन विभाग के अनुसार देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य पूर्वी भारत में गौर संरक्षण का एक उभरता हुआ केंद्र बनता जा रहा है। यहां घासभूमि पुनर्स्थापन, आर्द्रभूमि प्रबंधन, आवास सुधार और नियमित जनसंख्या निगरानी जैसे प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत किया जा सके।
इको-टूरिज्म और सामुदायिक भागीदारी
इस उत्सव का पहला संस्करण पिछले वर्ष आयोजित किया गया था, जिसमें ओडिशा के विभिन्न हिस्सों से 500 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया था। इनमें 68 इको डेवलपमेंट कमेटियों के सदस्य, 37 स्कूलों के छात्र और शिक्षक, युवा स्वयंसेवक तथा वन्यजीव प्रेमी शामिल थे। इस पहल ने यह भी दिखाया कि बाइसन संरक्षण से जुड़ा इको-टूरिज्म स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दे सकता है।
वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ इस तरह के कार्यक्रम लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारतीय बाइसन का वैज्ञानिक नाम ‘बोस गॉरस’ है और इसे दुनिया का सबसे बड़ा जंगली मवेशी माना जाता है।
- देब्रीगढ़ वन्यजीव अभयारण्य ओडिशा में हिराकुद जलाशय के पास स्थित है और यह समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है।
- इको डेवलपमेंट कमेटियाँ संरक्षित क्षेत्रों के आसपास समुदाय आधारित संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए बनाई जाती हैं।
- फल खाने वाले चमगादड़, जिन्हें फ्लाइंग फॉक्स कहा जाता है, परागण और बीज फैलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
देब्रीगढ़ में गौर की लगातार बढ़ती संख्या और बेहतर आवास प्रबंधन इस क्षेत्र को भारत में बाइसन संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बना रहे हैं। ‘इंडियन बाइसन फेस्ट’ जैसे आयोजन न केवल जनजागरूकता बढ़ाते हैं बल्कि वैज्ञानिक सहयोग और समुदाय की भागीदारी को भी मजबूत करते हैं, जिससे वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिलती है।