दीर्घावधि कृषक पूंजी सहकार योजना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की पहल

दीर्घावधि कृषक पूंजी सहकार योजना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की पहल

सहकारिता मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) ने ‘दीर्घावधि कृषक पूंजी सहकार योजना’ की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में कार्यरत सहकारी संस्थाओं को दीर्घकालिक वित्तीय सहायता प्रदान करना है। यह योजना ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, पूंजी निर्माण को बढ़ावा देने और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से संस्थागत ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

योजना का उद्देश्य और महत्व

इस योजना का मुख्य उद्देश्य सहकारी समितियों को दीर्घकालिक ऋण उपलब्ध कराना है, जिससे वे कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में निवेश कर सकें। यह योजना उत्पादन क्षमता बढ़ाने, ग्रामीण स्तर पर आधारभूत संरचना विकसित करने और आय के नए स्रोतों को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है।

इसके माध्यम से सहकारी संस्थाओं को स्थिर और पर्याप्त वित्तीय संसाधन मिलेंगे, जिससे वे किसानों और ग्रामीण समुदाय के आर्थिक विकास में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेंगी। यह योजना सहकारी क्रेडिट प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।

पात्रता मानदंड और वित्तीय अनुशासन

इस योजना का लाभ उठाने के लिए सहकारी संस्थाओं को कुछ निर्धारित मानकों को पूरा करना अनिवार्य है। किसी भी संस्था का कम से कम तीन वर्षों से संचालन में होना आवश्यक है।

इसके अलावा, संस्था की शुद्ध संपत्ति (नेट वर्थ) सकारात्मक होनी चाहिए और उसकी चुकता पूंजी में कोई गिरावट नहीं होनी चाहिए। पिछले तीन वर्षों में संस्था को नकद घाटा नहीं होना चाहिए और कम से कम दो वर्षों में लाभ अर्जित किया होना चाहिए। ये मानदंड वित्तीय अनुशासन और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं।

मूल्यांकन और निगरानी प्रक्रिया

NCDC ऋण स्वीकृति से पहले सहकारी संस्थाओं का विस्तृत मूल्यांकन करता है। इसमें संस्था की वित्तीय स्थिति, संचालन क्षमता और विश्वसनीयता की जांच की जाती है।

ऋण पर्याप्त सुरक्षा के आधार पर और सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए दिया जाता है। इसके बाद, परियोजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी NCDC के क्षेत्रीय और उप-कार्यालयों द्वारा की जाती है। नियमित निरीक्षण और समीक्षा से यह सुनिश्चित किया जाता है कि धन का सही उपयोग हो और ऋण का प्रवाह समय पर बना रहे।

डिफॉल्ट की स्थिति में वसूली प्रक्रिया

यदि कोई संस्था ऋण चुकाने में असफल रहती है, तो NCDC एक संरचित वसूली प्रक्रिया अपनाता है। सबसे पहले उधारकर्ता को पुनर्भुगतान के लिए नोटिस जारी किया जाता है।

यदि सुरक्षा के रूप में दिए गए पोस्ट-डेटेड चेक बाउंस हो जाते हैं, तो निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत कार्रवाई की जाती है। इसके बाद, यदि खाता गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) बन जाता है, तो SARFAESI अधिनियम, 2002 के तहत कार्रवाई शुरू की जाती है।

यदि इसके बाद भी भुगतान नहीं होता, तो ऋण वसूली अधिकरण (DRT) के समक्ष मामला दर्ज किया जा सकता है। यह पूरी प्रक्रिया वित्तीय अनुशासन बनाए रखने और संस्थागत ऋण प्रणाली की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) की स्थापना 1963 में हुई थी।
  • यह सहकारिता मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है, जिसकी स्थापना 2021 में हुई।
  • यह योजना सहकारी संस्थाओं की दीर्घकालिक ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शुरू की गई है।
  • SARFAESI अधिनियम, 2002 और DRT प्रक्रिया ऋण वसूली के प्रमुख कानूनी साधन हैं।

दीर्घावधि कृषक पूंजी सहकार योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और सहकारी क्षेत्र को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह योजना न केवल कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देगी, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण विकास को गति देने में भी सहायक सिद्ध होगी।

Originally written on March 19, 2026 and last modified on March 19, 2026.

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