दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: अंतरिम भरण-पोषण के समय पत्नी की आय मान लेना अनुचित
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) के दौरान यह मान लेना कि पत्नी आय अर्जित कर रही है या स्वयं का पालन-पोषण कर सकती है—बिना किसी ठोस साक्ष्य के—कानूनन स्वीकार्य नहीं है। यह निर्णय पति-पत्नी के बीच चल रहे एक विवाद में आया, जहां पति ने दावा किया कि पत्नी कार्यरत है, परंतु इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका।
यह फैसला न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा सुनाया गया, जो कि भरण-पोषण संबंधी कानून की व्याख्या में एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
आय के अनुमान पर न्यायालय की टिप्पणी
मामले में पति ने यह दावा किया कि पत्नी एक नर्सरी शिक्षिका के रूप में कार्यरत है और आय अर्जित कर रही है। परंतु इस दावे के समर्थन में कोई प्रमाण जैसे वेतन पर्ची या संस्थागत प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया। न्यायालय ने इसे “सिर्फ दावा” (bald assertion) मानते हुए खारिज कर दिया और यह भी बताया कि महिला केवल कक्षा 11 तक पढ़ी है, जिससे उसकी स्वावलंबन की संभावना सीमित मानी गई।
कानूनी परिप्रेक्ष्य और फैमिली कोर्ट का आदेश
यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के अंतर्गत आया, जो पत्नी, बच्चों और माता-पिता के लिए भरण-पोषण का प्रावधान करती है। दंपति का विवाह जून 2021 में मुस्लिम रीति से हुआ था। पत्नी ने दावा किया कि उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और वह 2022 में matrimonial home छोड़ने को विवश हुई, जिसके बाद उसके पास कोई स्वतंत्र आय स्रोत नहीं था।
मार्च 2024 में फैमिली कोर्ट ने ₹2,500 प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण की राशि निर्धारित की थी, जिसे महिला ने अपर्याप्त बताते हुए उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
पति की आय का मूल्यांकन
पत्नी ने दावा किया कि पति एक निजी स्कूल में शिक्षक है और ₹25,000 मासिक वेतन के साथ-साथ ट्यूशन, किराये और किराना दुकान से भी आय प्राप्त करता है। इसके विपरीत, पति ने कहा कि वह एक NGO में विशेष शिक्षक के रूप में कार्य करता है और केवल ₹10,000 मासिक कमाता है।
कोर्ट ने पति के इस दावे को अविश्वसनीय माना क्योंकि यह एक स्नातक कुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन से भी कम था और उसने अपने बैंक स्टेटमेंट भी पूरे नहीं दिए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- CrPC की धारा 125 पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण की व्यवस्था करती है।
- अंतरिम भरण-पोषण अंतिम निर्णय आने तक दी जाती है।
- न्यूनतम वेतन के आधार पर अदालत आय का अनुमान लगा सकती है जब कोई स्पष्ट प्रमाण न हो।
- आय के दावे बिना दस्तावेज के अदालत में मान्य नहीं होते।
भरण-पोषण में वृद्धि और निर्देश
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में कुशल स्नातक श्रमिक के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतन—₹13,200 प्रतिमाह—को आधार मानते हुए अंतरिम भरण-पोषण की राशि बढ़ाकर ₹3,500 प्रति माह कर दी। साथ ही, पति को निर्देश दिया गया कि वह तीन माह के भीतर बकाया राशि का भुगतान करे, क्योंकि पूर्व में निर्धारित राशि दंपति की सामाजिक स्थिति और पत्नी की आयहीनता के अनुरूप नहीं थी।
यह फैसला पारिवारिक मामलों में महिलाओं के अधिकारों और न्यायकर्ता के सम्यक विवेक के महत्व को रेखांकित करता है, खासकर तब जब आर्थिक असमानता स्पष्ट रूप से सामने हो।