तमिलनाडु में तेजी से बढ़ता मधुमेह संकट: आहार, जीवनशैली और नीति सुधार की आवश्यकता
भारत एक गंभीर मधुमेह (डायबिटीज़) महामारी की ओर बढ़ रहा है और तमिलनाडु इस संकट का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। हालिया आंकड़े यह संकेत देते हैं कि मधुमेह और प्रीडायबिटीज़ (पूर्व-मधुमेह) दोनों में तीव्र वृद्धि हो रही है, जिससे राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे पर गंभीर दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही नीतिगत और व्यवहारिक हस्तक्षेप नहीं किए गए, तो यह स्थिति अन्य गैर-संचारी रोगों (NCDs) को भी बढ़ावा दे सकती है।
मधुमेह और प्रीडायबिटीज़ में चिंताजनक वृद्धि
भारत में वर्तमान में लगभग 10.1 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, जबकि 13.6 करोड़ लोगों को प्रीडायबिटीज़ है। तमिलनाडु में यह स्थिति और भी गंभीर है। ICMR–INDIAB अध्ययन के अनुसार, राज्य में 20 वर्ष से ऊपर के वयस्कों में मधुमेह की दर 2008–2010 में 11.1% से बढ़कर 2022–2023 में 22.7% हो गई, जो 104% वृद्धि दर्शाती है।
प्रीडायबिटीज़ की दर भी 12.2% से बढ़कर 24.8% हो गई है, जिससे यह अनुमान लगाया गया है कि 12 मिलियन से अधिक लोग तमिलनाडु में मधुमेह से पीड़ित हैं, और 10 मिलियन लोग जोखिम क्षेत्र में हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेज़ी से फैल रहा संकट
मधुमेह अब केवल शहरी समस्या नहीं रह गई है। ग्रामीण तमिलनाडु में भी मधुमेह की दर 8.3% से बढ़कर 18.3% हो गई है—जो 120% की वृद्धि दर्शाती है। यह बदलाव ग्रामीण क्षेत्रों में बदलती जीवनशैली, कम होती शारीरिक गतिविधि और भोजन के स्वरूप में हो रहे बदलाव का संकेत है।
यह भी पाया गया है कि प्रीडायबिटीज़ से मधुमेह में संक्रमण औसतन चार वर्षों में हो सकता है, जो स्थिति की गंभीरता को और बढ़ाता है।
आहार संबंधी कारण: संकट की जड़
इस संकट के पीछे आनुवांशिक कारणों की तुलना में पर्यावरणीय और जीवनशैली कारक अधिक जिम्मेदार हैं। अध्ययन में पाया गया कि तमिलनाडु में कैलोरी का लगभग 65% हिस्सा कार्बोहाइड्रेट से आता है, मुख्यतः पॉलिश्ड सफेद चावल से, जिसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत अधिक होता है।
प्रोटीन का सेवन मात्र 10% है, जो अनुशंसित स्तर से बहुत कम है। मद्रास डायबिटीज़ रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार, अधिक सफेद चावल खाने से मधुमेह, मोटापा, लिपिड असंतुलन और फैटी लीवर रोग की आशंका बढ़ जाती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- तमिलनाडु में मधुमेह और प्रीडायबिटीज़ की 10 वर्षों में 100% से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।
- प्रीडायबिटीज़ अगर नियंत्रित न हो तो चार वर्षों में मधुमेह में बदल सकता है।
- भारत में औसतन 65% कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से प्राप्त होती है।
- कार्बोहाइड्रेट सेवन में 5% की कमी से भी मधुमेह का खतरा घट सकता है।
नीतिगत हस्तक्षेप और आगे की राह
तमिलनाडु में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) पर अत्यधिक निर्भरता ने खाद्य विविधता को सीमित कर दिया है। गरीब वर्गों के आहार में चावल और चीनी की अधिकता, तथा दाल, फल व सब्जियों की कमी मधुमेह को बढ़ावा दे रही है।
विशेषज्ञ डॉ. वी मोहन और डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने पीडीएस सुधार की वकालत की है—दालों की मात्रा बढ़ाने और चावल-चीनी की कटौती की सिफारिश की है। कर्नाटक का मिलेट समावेश मॉडल और सहकारी फल वितरण योजनाएं भविष्य की राह दिखाती हैं।
तमिलनाडु की सशक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य विरासत इसे भारत में मधुमेह के खिलाफ संघर्ष का अग्रणी राज्य बना सकती है। रोकथाम पर केंद्रित पोषण नीतियाँ, स्थायी खाद्य वितरण और सामुदायिक जागरूकता इस संकट को नियंत्रित करने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।