डॉ. ए. ई. मुथुनायगम को पद्म श्री 2026: भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के स्तंभ

डॉ. ए. ई. मुथुनायगम को पद्म श्री 2026: भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के स्तंभ

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के आधारशिला रखने वाले वैज्ञानिकों में से एक, डॉ. ए. ई. मुथुनायगम को विज्ञान और इंजीनियरिंग में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2026 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। उन्हें भारत के लिक्विड रॉकेट प्रणोदन कार्यक्रम के निर्माता के रूप में जाना जाता है, जिनके कार्यों ने भारत को एक सशक्त अंतरिक्ष राष्ट्र बनने की दिशा में मजबूती दी।

प्रारंभिक जीवन और शैक्षणिक पृष्ठभूमि

डॉ. मुथुनायगम का जन्म 11 जनवरी 1939 को तमिलनाडु के नागरकोइल में हुआ था। उन्होंने 1960 में मद्रास विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु से मास्टर डिग्री प्राप्त की और अमेरिका की पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी पूरी की, जहाँ उन्हें नासा से जुड़े उच्चस्तरीय एयरोस्पेस शोध का अनुभव प्राप्त हुआ। उन्होंने केरल विश्वविद्यालय से कानून में भी स्नातक (LLB) किया।

भारत के प्रारंभिक अंतरिक्ष कार्यक्रम में भूमिका

1966 में डॉ. मुथुनायगम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े, जब वे डॉ. विक्रम साराभाई द्वारा चुने गए प्रथम पीढ़ी के वैज्ञानिकों में शामिल हुए। उन्होंने “स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर” (जो बाद में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर बना) में प्रमुख अभियंत्रण प्रभागों का नेतृत्व किया और रोहिणी रॉकेट कार्यक्रम जैसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं का संचालन किया। इन प्रयासों ने भारत की स्वदेशी प्रक्षेपण क्षमता की नींव रखी।

भारत के लिक्विड प्रणोदन कार्यक्रम की स्थापना

डॉ. मुथुनायगम का सबसे बड़ा योगदान लिक्विड प्रपल्शन तकनीक के क्षेत्र में रहा है। उन्होंने फ्रांसीसी सहयोग से विकसित “विकास इंजन” कार्यक्रम के परियोजना प्रमुख के रूप में कार्य किया। यह इंजन आज भी PSLV और GSLV जैसे भारत के प्रमुख प्रक्षेपण यानों के कई चरणों को शक्ति देता है। 1985 में, वे “लिक्विड प्रपल्शन सिस्टम्स सेंटर” (LPSC) के संस्थापक निदेशक बने और परीक्षण एवं असेंबली के बड़े केंद्रों की स्थापना की, जिससे भारत के प्रक्षेपण अभियानों को नई गति मिली।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • पद्म श्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
  • LPSC भारत में लिक्विड और क्रायोजेनिक प्रणोदन प्रणाली के विकास का प्रमुख केंद्र है।
  • विकास इंजन PSLV और GSLV जैसे रॉकेटों के कई चरणों में प्रयुक्त होता है।
  • VSSC (विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर) इसरो का प्रमुख प्रक्षेपण यान विकास केंद्र है।

इसरो से आगे की भूमिका

LPSC में कार्यकाल के बाद डॉ. मुथुनायगम ने “डिपार्टमेंट ऑफ ओशन डेवलपमेंट” के सचिव के रूप में भी कार्य किया और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक निकायों का नेतृत्व किया। उन्होंने यूनेस्को की Intergovernmental Oceanographic Commission के तहत वैश्विक समितियों का मार्गदर्शन किया और IIT मद्रास के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष भी रहे। उन्हें कई भारतीय व अंतरराष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमियों का फेलो भी नियुक्त किया गया।

डॉ. मुथुनायगम का कार्य भारत के वैज्ञानिक और अंतरिक्ष ढांचे को नई ऊंचाइयों तक ले गया है। उनका जीवन कार्य प्रेरणादायक है और भावी पीढ़ियों के लिए अनुसंधान एवं नवाचार में समर्पण का प्रतीक बना रहेगा।

Originally written on January 27, 2026 and last modified on January 27, 2026.

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