डेनमार्क में 2000 वर्ष पुराना लौह युग मंदिर परिसर: उत्तरी यूरोप के शक्ति केंद्रों पर नई रोशनी
डेनमार्क के मध्य जटलैंड क्षेत्र में एजस्ट्रुपहोम के पास हेड़ेगार्ड नामक स्थान पर घास के मैदानों के नीचे छिपा 2000 वर्ष पुराना लौह युग का मंदिर परिसर हाल ही में पुरातत्वविदों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण खोज साबित हुआ है। लंबे समय तक सामान्य कृषि भूमि माने जाने वाले इस क्षेत्र के नीचे एक सुव्यवस्थित और संरक्षित बस्ती के अवशेष मिले हैं, जो राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक प्रभावशाली केंद्र का संकेत देते हैं। संरचनाओं का आकार और जटिलता दर्शाती है कि यह कोई साधारण ग्रामीण गांव नहीं, बल्कि ईस्वी सन् की शुरुआत के आसपास एक सुदृढ़ और संगठित शक्ति केंद्र था।
भूले-बिसरे शक्ति केंद्र की पुनर्खोज
इस स्थल का पहला महत्वपूर्ण संकेत वर्ष 1986 में मिला, जब पुरातत्वविद ऑरला मैडसेन ने यहां एक समृद्ध कब्रगाह की खोज की। इसमें हथियारों और उच्च वर्ग से संबंधित कीमती वस्तुओं के साथ दफनाए गए अवशेष मिले, जो उस समय के विशिष्ट योद्धा वर्ग की उपस्थिति दर्शाते हैं। 1993 में खुदाई कार्य रुक गया, जिससे क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अनछुआ रह गया।
वर्ष 2016 में म्यूजियम मिडट्जिलैंड के नेतृत्व में शोध कार्य फिर से शुरू हुआ, लेकिन 2023 में यह स्पष्ट हुआ कि यह कब्रगाह एक विशाल किलेबंद बस्ती का हिस्सा थी। सर्वेक्षण में कार्यशालाएं, उच्च वर्ग के निवास, रक्षात्मक लकड़ी की बाड़ और एक केंद्रीय मंदिर संरचना का पता चला, जो एक संगठित और श्रेणीबद्ध समाज की ओर संकेत करता है।
मंदिर की वास्तुकला का महत्व
परिसर के केंद्र में लगभग 15×16 मीटर आकार का एक आयताकार मंदिर मिला है, जिसकी तिथि लगभग शून्य ईस्वी के आसपास की मानी जाती है। मजबूत स्तंभों की एक परिधि ने अंदरूनी संरचना को घेरे रखा था। भीतर की दीवारें गहराई से गड़े खंभों और मिट्टी से लेपित तख्तों से निर्मित थीं।
दक्षिण दिशा की ओर खुलने वाला प्रवेश द्वार एक ऊंचे 2×2 मीटर के चूल्हे तक जाता था, जिस पर मुद्रांकित और रेखीय सजावट पाई गई है। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह चूल्हा घरेलू उपयोग के बजाय धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रयोग किया जाता था। यह संरचना डेनमार्क के लौह युग में औपचारिक धार्मिक वास्तुकला के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती है।
रक्षा व्यवस्था, व्यापार और रोमन प्रभाव
हेड़ेगार्ड की किलेबंद संरचना सुविचारित सैन्य योजना को दर्शाती है। लगभग शून्य ईस्वी के समय रोमन साम्राज्य का विस्तार एल्बे नदी तक पहुंच चुका था, जो जटलैंड के निकट स्थित है। संभव है कि रोमन खतरे की आशंका में यहां रक्षात्मक व्यवस्थाएं विकसित की गई हों। लकड़ी की मजबूत बाड़ और रक्षा प्रणाली रोमन सैन्य तकनीकों की जानकारी का संकेत देती हैं।
यह स्थल केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र नहीं था, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व और आर्थिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा होगा। इससे स्पष्ट होता है कि यहां के लोग स्थानीय जनजातीय नेटवर्क से आगे बढ़कर व्यापक व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क रखते थे।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* उत्तरी यूरोप में लौह युग लगभग 500 ईसा पूर्व से 800 ईस्वी तक माना जाता है।
* जटलैंड प्रायद्वीप डेनमार्क का मुख्य भूभाग बनाता है और इसका एक हिस्सा उत्तरी जर्मनी में स्थित है।
* रोमन साम्राज्य का विस्तार ईस्वी सन् की शुरुआत में एल्बे नदी तक पहुंच गया था।
* लौह युग स्कैंडिनेविया में हथियारों के साथ दफनाए गए अवशेष उच्च योद्धा वर्ग का संकेत देते हैं।
हेड़ेगार्ड की यह खोज स्कैंडिनेवियाई इतिहास की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती है, जिसमें उस काल को अपेक्षाकृत विकेन्द्रीकृत माना जाता था। संरक्षित सांस्कृतिक परतें दर्शाती हैं कि उस समय डेनमार्क में संगठित और जटिल समाज विद्यमान थे, जो समन्वित रक्षा, दूरगामी व्यापार और औपचारिक धार्मिक परंपराओं को विकसित करने में सक्षम थे। यह खोज उत्तरी यूरोप के प्रारंभिक शक्ति केंद्रों की समझ को एक नया आयाम प्रदान करती है।