झारखंड में PESA नियमों की अधिसूचना: आदिवासी स्वशासन की नयी दिशा

झारखंड में PESA नियमों की अधिसूचना: आदिवासी स्वशासन की नयी दिशा

झारखंड को राज्यhood प्राप्त हुए 25 वर्ष बाद पंचायती राज (अनुसूचित क्षत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) के नियमों की अधिसूचना जारी कर दी गई है, जो पंचम अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समाज के लिए स्वशासन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस फैसले ने ग्राम सभा की भूमिका, प्रथा आधारित कानून और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे संवैधानिक तथा सामाजिक विषयों पर एक नई बहस को जन्म दिया है।

विलंबित क्रियान्वयन और क्षेत्रीय विस्तार

PESA को संसद ने 1996 में पारित किया था ताकि अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन से जुड़े शासन को मजबूत किया जा सके तथा आदिवासी समुदायों को अपने संसाधनों और निर्णयों में अधिकार मिले। देश के दस पंचम अनुसूचित राज्यों में से आठ राज्यों ने इसे पहले लागू कर लिया था, लेकिन झारखंड में यह 25 वर्ष के बाद ही लागू हुआ। यह नियमन झारखंड के 24 जिलों में से 13 जिलों में पूर्ण रूप से लागू होगा, जिनमें रांची, खूँटी, गुमला, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम प्रमुख हैं। जबकि पलामू, गढ़वा और गोड्डा में इसे आंशिक रूप से लागू किया गया है।
2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की लगभग 26.3 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति की है, जिनमें से आधे से अधिक 12,000 से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं।

ग्राम सभा को दी गई व्यापक शक्तियाँ

नोटिफाइड नियमों के अंतर्गत ग्राम सभा को अनुसूचित क्षेत्रों में सबसे प्रमुख और सर्वोच्च संस्था के रूप में स्थान दिया गया है। ग्राम सभा के अध्यक्ष का चयन स्थानीय प्रचलित रीतियों और पारंपरिक परंपराओं के आधार पर किया जाएगा। ग्राम सभाओं को सामुदायिक संसाधनों जैसे लघु खनिज, जल स्रोतों, चरागाहों आदि का प्रबंधन करने, स्थानीय विवादों को समाधान करने तथा अधिकतम दो हजार रुपये तक दंड लगाने का अधिकार मिला है।
हालाँकि, ग्राम सभाओं और उनके सीमाओं की मान्यता और अधिसूचना जिला प्रशासन द्वारा तय की जाएगी, जो आलोचकों द्वारा PESA की भावना को कमज़ोर करने वाला प्रावधान बताया जा रहा है।

संवैधानिक तथा राजनीतिक बहस

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस निर्णय को ऐतिहासिक बताते हुए कहा है कि यह भूमि, वन और जल संसाधनों पर आदिवासी नियंत्रण को पुनर्स्थापित करेगा। वहीं विपक्षी नेताओं जैसे बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा का तर्क है कि यह नियम PESA की मूल भावना को कमजोर करते हैं और ग्राम सभा की सर्वोच्चता तथा प्रथा आधारित कानून को किनारे कर देते हैं।
झारखंड में परंपरागत पंचायती व्यवस्था जैसे मांकी–मुंडा और मझी–परगना को औपचारिक रूप से मान्यता दी गई है तथा 28,500 से अधिक पारंपरिक कार्यकर्ताओं को मानदेय भी प्रदान किया जाता है, जो राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का हिस्सा हैं।

संसाधन नियंत्रण और अपेक्षित परिणाम

किसी भी स्वशासन मॉडल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वास्तविक संसाधन अधिकार और वित्तीय नियमन कितना प्रभावी रूप से ग्राम सभा को सौंपी जाती है। आलोचकों का कहना है कि वन संसाधन, जिला खनिज कोष (DMF) और आदिवासी उप योजनाएँ (Tribal Sub Plan) अभी भी ग्राम सभा के नियंत्रण से बाहर हैं। झारखंड में लगभग 40 प्रतिशत भारत के खनिज स्रोत पाए जाते हैं, बावजूद इसके आदिवासी क्षेत्रों में गरीबी, उच्च एनीमिया दर तथा मजदूरी पर निर्भरता जैसे सामाजिक संकेतक चिंताजनक बने हुए हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • PESA पंचम अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन बढ़ाने के लिए 1996 में लागू किया गया था।
  • यह नियम अनुच्छेद 244 के अंतर्गत पंचम अनुसूचित क्षेत्रों में लागू होता है।
  • झारखंड विधानसभा में 81 सदस्यों में 28 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित हैं
  • ग्राम सभा PESA के अंतर्गत मूल संस्थागत इकाई मानी जाती है।

झारखंड के PESA नियमों के अधिसूचना से यह स्पष्ट होता है कि राज्य स्तर पर आदिवासी स्वशासन और स्थानीय निर्णय लेने की प्रक्रियाओं को सशक्त करने की दिशा में एक पहल की गई है। परंतु प्रशासनिक नियंत्रण, संसाधन अधिकारों तथा पारंपरिक न्याय प्रणाली की भूमिका को लेकर जारी बहस यह संकेत देती है कि वास्तविक परिवर्तन तभी संभव होगा जब नियमों का प्रभावी लागूकरण और आदिवासी समुदाय की सशक्त भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

Originally written on January 17, 2026 and last modified on January 17, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *