झारखंड ने 25वां स्थापना दिवस जनसांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाया
झारखंड ने अपना 25वां स्थापना दिवस पूरे राज्य में उत्साह और पारंपरिक रंगों के साथ मनाया। इस अवसर पर राज्य के विभिन्न हिस्सों में लोकनृत्य, गीत-संगीत और सांस्कृतिक झांकियों ने जनजीवन में नई ऊर्जा भर दी। कार्यक्रमों ने झारखंड की आदिवासी विरासत को केंद्र में रखकर राज्य की विविध सांस्कृतिक पहचान का उत्सव मनाया।
राज्यभर में जीवंत समारोह
रांची और हजारीबाग इस उत्सव के प्रमुख केंद्र बने, जहाँ शहर के चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर कलाकारों ने पारंपरिक नृत्यों का प्रदर्शन किया। जिलास्तरीय प्रशासन और सांस्कृतिक विभागों के संयुक्त आयोजन ने इन समारोहों को विशेष बना दिया। ढोल-नगाड़ों की थाप, लोकधुनों की गूंज और रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों ने पूरे दोपहर शहरों को उत्सव के रंग में रंग दिया।
सांस्कृतिक विविधता का भव्य प्रदर्शन
कार्यक्रमों में नागपुरी, संथाली, हो, कुरुख और उरांव समुदाय के पारंपरिक नृत्य रूपों का प्रदर्शन किया गया। रांची के न्यूक्लियस मॉल में बुरमु से आए कलाकारों ने ‘उरांव कर्सा नृत्य’ प्रस्तुत किया यह एक सामूहिक कल्याण की प्रार्थना से जुड़ा अनुष्ठानिक नृत्य है, जिसमें कलाकार सजे हुए कलश लेकर तालबद्ध ढंग से नृत्य करते हैं। पारंपरिक वेशभूषा, लयबद्ध गतियाँ और सामूहिक उत्साह ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
हजारीबाग का भव्य सांस्कृतिक जुलूस
हजारीबाग में स्थापना दिवस के अवसर पर एक विशाल सड़क नृत्य कार्निवाल का आयोजन हुआ। यह जुलूस ‘बड़ा अखाड़ा’ से शुरू होकर शहर के प्रमुख स्थलों से गुजरते हुए वापस उसी स्थान पर पहुँचा। जिलाधिकारी और अन्य अधिकारियों के नेतृत्व में सैकड़ों कलाकारों और विद्यार्थियों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियाँ दीं। नगाड़ों और स्थानीय वाद्य यंत्रों की गूंज ने माहौल को उल्लासमय बना दिया और जिलेभर से लोग इस उत्सव में शामिल हुए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- झारखंड ने अपना 25वां स्थापना दिवस राज्यव्यापी सांस्कृतिक आयोजनों के साथ मनाया।
- प्रमुख नृत्य रूपों में नागपुरी, संथाली, हो, कुरुख और उरांव कर्सा नृत्य शामिल रहे।
- प्रमुख कार्यक्रम रांची और हजारीबाग के सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित किए गए।
- उरांव कर्सा नृत्य में सजे हुए कलश समृद्धि और सामूहिक कल्याण का प्रतीक हैं।
पहचान और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव
स्थापना दिवस के इस महोत्सव ने झारखंड की जनजातीय और लोक संस्कृति के संरक्षण के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया। इसने यह संदेश दिया कि परंपरा और आधुनिकता का संगम तभी सार्थक है जब समाज अपने मूल सांस्कृतिक मूल्यों को साझा रूप में जीता है। झारखंड ने अपने 25वें स्थापना वर्ष पर न केवल अतीत को सम्मानित किया बल्कि सांस्कृतिक एकता और सामूहिक पहचान का जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत किया।