जलवायु परिवर्तन से नीलगिरि वुड पिजन के आवास पर खतरा
हालिया वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण इस सदी के अंत तक नीलगिरि वुड पिजन के आवास में भारी कमी आ सकती है। पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली यह पक्षी प्रजाति क्षेत्रीय रूप से स्थानिक (एंडेमिक) है और बढ़ते तापमान के कारण इसके उपयुक्त आवास क्षेत्र में तेजी से गिरावट आने की आशंका है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान संरक्षण स्थिति स्थिर होने के बावजूद भविष्य के जलवायु परिदृश्य इस प्रजाति के लिए गंभीर पारिस्थितिक जोखिम दर्शाते हैं।
मैक्सएंट मॉडल से किया गया भविष्य का विश्लेषण
“बायोजियोग्राफी एंड हैबिटेट सूटेबलिटी ऑफ द नीलगिरि वुड पिजन यूजिंग मैक्सएंट” शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन में मैक्सएंट मशीन लर्निंग मॉडल का उपयोग कर भविष्य के आवास का आकलन किया गया। यह शोध भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द इंडियन नेशनल साइंस अकादमी’ में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन में ईबर्ड नामक नागरिक विज्ञान मंच से प्राप्त 9,757 रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया, जिनमें से 117 स्थानों पर इस पक्षी की उपस्थिति की पुष्टि हुई। नौ जैव-जलवायु कारकों के आधार पर भविष्य के पर्यावरणीय परिवर्तनों का अनुमान लगाया गया।
शोध के अनुसार जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सीधा नहीं बल्कि जटिल हो सकता है। वर्ष 2021 से 2040 के बीच कुछ निम्न पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूल होने से आवास थोड़े समय के लिए बढ़ सकता है। लेकिन 2081 से 2100 के बीच उच्च गुणवत्ता वाले आवास क्षेत्रों में तीव्र कमी आने की संभावना है, जिससे प्रजाति के आवास में संकुचन और विखंडन हो सकता है।
‘स्काई आइलैंड’ पारिस्थितिकी तंत्र की विशेष प्रजाति
नीलगिरि वुड पिजन मुख्य रूप से तमिलनाडु और केरल के नीलगिरि तथा अनामलाई पर्वतों के उच्च ऊंचाई वाले सदाबहार और आर्द्र पर्णपाती वनों में पाया जाता है। इसके अलावा बिलिगिरिरंगन पहाड़ियों, नंदी हिल्स और उत्तरी महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में भी इसकी सीमित आबादी दर्ज की गई है।
इन उच्च पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्रों को “स्काई आइलैंड” कहा जाता है, क्योंकि ये अलग-थलग स्थित होते हैं और इनमें स्थानिक प्रजातियों की संख्या अधिक होती है। नीलगिरि वुड पिजन का सीमित ऊंचाई क्षेत्र, बिखरा हुआ वितरण और घने वन छत्र पर निर्भरता इसे अत्यधिक विशिष्ट बनाती है। यही कारण है कि वनों की कटाई, बागान विस्तार, अवसंरचना विकास और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक इसके लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।
ऊंचाई की ओर स्थानांतरण और संभावित जोखिम
वैज्ञानिकों ने “अप-स्लोप शिफ्टिंग” नामक घटना की ओर भी ध्यान दिलाया है, जिसमें पर्वतीय प्रजातियां तापमान बढ़ने के कारण अधिक ऊंचाई की ओर स्थानांतरित होने लगती हैं। शुरुआती चरण में यह बदलाव कुछ नए क्षेत्रों को अनुकूल बना सकता है, लेकिन लंबे समय में पहाड़ों की ऊपरी सीमाओं पर उपलब्ध आवास सीमित हो जाता है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने अभी इस प्रजाति को “कम चिंता” श्रेणी में रखा है, लेकिन यह आकलन मुख्यतः इसके अनुमानित वितरण और 10,000 से अधिक परिपक्व पक्षियों की संभावित आबादी पर आधारित है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रजनन व्यवहार, आबादी और आवास उपयोग पर व्यवस्थित क्षेत्रीय अध्ययन अभी भी सीमित हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- नीलगिरि वुड पिजन पश्चिमी घाट जैव विविधता हॉटस्पॉट की स्थानिक पक्षी प्रजाति है।
- मैक्सएंट एक मशीन लर्निंग आधारित उपकरण है, जिसका उपयोग प्रजातियों के संभावित वितरण का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है।
- “स्काई आइलैंड” शब्द उच्च पर्वतीय और अलग-थलग पारिस्थितिक तंत्रों के लिए प्रयोग किया जाता है।
- ईबर्ड एक वैश्विक नागरिक विज्ञान मंच है जहां पक्षी अवलोकनों का डेटा संकलित किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी घाट के उच्च पर्वतीय वनों के लिए जलवायु-सहिष्णु संरक्षण रणनीतियों की आवश्यकता है। दीर्घकालिक निगरानी, नियमित जनसंख्या सर्वेक्षण और संरक्षण स्थिति का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन इस प्रजाति की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होंगे। वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु जोखिम आकलन और पारिस्थितिक अध्ययन को एकीकृत कर ही इस दुर्लभ पर्वतीय पक्षी के अस्तित्व को सुरक्षित रखा जा सकता है।