जलवायु कार्यवाही विकास की बाधा नहीं, अवसर है: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन का ‘भारत क्लाइमेट फोरम 2026’ में संबोधन
भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि जलवायु कार्यवाही को विकास की रुकावट नहीं, बल्कि समावेशी विकास, ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य-उन्मुख अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए एक रणनीतिक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। वे नई दिल्ली में आयोजित ‘भारत क्लाइमेट फोरम 2026’ के उद्घाटन सत्र में संबोधित कर रहे थे।
सभ्यता-संस्कारों में निहित है भारत का पर्यावरण दृष्टिकोण
उपराष्ट्रपति ने इस आयोजन को राष्ट्रीय संवाद मंच के रूप में विकसित करने के लिए काउंसिल फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक अंडरस्टैंडिंग की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत की जलवायु और सततता को लेकर प्रतिबद्धता केवल आधुनिक वैज्ञानिक चिंताओं पर आधारित नहीं, बल्कि इसकी सभ्यतागत परंपराओं में गहराई से निहित है।
उन्होंने जल संरक्षण, सतत कृषि, जैव विविधता संरक्षण और प्रकृति (Prakriti) व अपरिग्रह जैसे नैतिक सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि सदियों पहले भारत में प्रकृति के साथ सामंजस्य को जीवनशैली के रूप में अपनाया गया था।
विकास और उत्तरदायित्व में संतुलन
पिछले दशक में भारत की विकास यात्रा का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत ने लगातार विकास और समानता, और वर्तमान आवश्यकताओं तथा भविष्य की ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह दिखाया है कि विकासशील राष्ट्र भी जलवायु उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दे सकते हैं, बिना अपनी विकास संबंधी प्राथमिकताओं से समझौता किए।
पंचामृत लक्ष्य और स्वदेशी स्वच्छ प्रौद्योगिकी का आह्वान
उपराष्ट्रपति ने COP26 में घोषित भारत के ‘पंचामृत’ जलवायु लक्ष्य की चर्चा करते हुए कहा कि ये लक्ष्य 2050 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की दिशा में स्पष्ट मार्ग प्रदान करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि एक विकसित भारत को केवल आयातित प्रौद्योगिकियों या कमजोर आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने आह्वान किया कि भारत को स्वदेशी स्वच्छ प्रौद्योगिकी, लचीला विनिर्माण, और भविष्य के लिए तैयार कार्यबल पर निवेश बढ़ाना चाहिए। भारत आज नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, जलवायु-स्मार्ट कृषि और डिजिटल समाधान जैसे क्षेत्रों में वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत ने COP26 (ग्लासगो, 2021) में पंचामृत जलवायु प्रतिबद्धताएं घोषित की थीं।
- भारत का लक्ष्य है 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net-Zero) उत्सर्जन प्राप्त करना।
- इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भारत की पहल पर आरंभ हुआ था।
- कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेसिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) का नेतृत्व भारत करता है।
वैश्विक सहयोग और भारत की जलवायु नेतृत्व भूमिका
उपराष्ट्रपति ने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन एक साझी चुनौती है और इसका समाधान केवल सामूहिक वैश्विक प्रयासों से संभव है। उन्होंने बताया कि भारत ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस के माध्यम से ग्लोबल साउथ देशों को सस्ती सौर ऊर्जा समाधान के लिए संगठित किया है।
इसके अलावा भारत का CDRI में नेतृत्व यह दर्शाता है कि देश जलवायु-जनित झटकों से बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाए हुए है।
इस कार्यक्रम में नीति-निर्माता, उद्योग नेता और विशेषज्ञ शामिल हुए, जिनमें पूर्व सांसद एन. के. सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी भी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
भारत क्लाइमेट फोरम 2026 ने यह स्पष्ट किया कि भारत का भविष्य पर्यावरणीय जिम्मेदारी और नवाचार-आधारित विकास के संतुलन पर आधारित है।