छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में जल संरक्षण का सामुदायिक मॉडल
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले ने सामुदायिक भागीदारी से जल संरक्षण का एक प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत किया है। यहाँ ‘जल संचय जन भागीदारी’ पहल के माध्यम से किसानों को भूजल पुनर्भरण और जल प्रबंधन के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम ‘आवा पानी झोकी’ अभियान के तहत लागू किया गया है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस पहल में किसानों को अपनी कृषि भूमि का लगभग पाँच प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण संरचनाओं के लिए स्वेच्छा से उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत खेतों में छोटे जल संचयन तालाब और सीढ़ीनुमा गड्ढे बनाए जाते हैं, जो मानसून के दौरान वर्षा जल को संग्रहित करते हैं। यह पानी धीरे-धीरे जमीन में समा कर भूजल स्तर को पुनर्भरित करता है और क्षेत्र में जल उपलब्धता को बेहतर बनाता है।
खेत आधारित जल पुनर्भरण मॉडल
इस पहल का मुख्य उद्देश्य खेतों के भीतर ही विकेन्द्रित जल संरक्षण को बढ़ावा देना है। किसान अपने खेतों में छोटे तालाब और गड्ढे बनाते हैं, जो वर्षा के पानी को रोककर जमीन में समाहित होने में मदद करते हैं। इससे भारी वर्षा के दौरान पानी के बहकर निकल जाने की समस्या कम होती है।
जल संचयन से मिट्टी की नमी बढ़ती है और मिट्टी का कटाव भी कम होता है। इससे खेती अधिक टिकाऊ बनती है और सूखे मौसम में भी फसलों के लिए पानी उपलब्ध रहता है। यह मॉडल स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जल प्रबंधन का एक प्रभावी उपाय साबित हो रहा है।
सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय नेतृत्व
इस अभियान की सफलता में स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। क्षेत्र की महिलाओं ने ‘नीर नायिका’ के रूप में नेतृत्व की भूमिका निभाई है। वे घर-घर जाकर जल संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाती हैं और वर्षा जल पुनर्भरण के लिए सोख्ता गड्ढे बनाने में लोगों की मदद करती हैं।
इसके अलावा युवा स्वयंसेवकों को ‘जल दूत’ के रूप में शामिल किया गया है। ये स्वयंसेवक खाइयों की मैपिंग, नहरों की सफाई और नुक्कड़ नाटक तथा दीवार लेखन जैसे माध्यमों से जागरूकता अभियान चलाते हैं। इस प्रकार स्थानीय प्रशासन, किसान और समुदाय मिलकर जल संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास कर रहे हैं।
पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन
इस कार्यक्रम के तहत सामुदायिक श्रमदान से 440 से अधिक पारंपरिक तालाबों का पुनर्जीवन किया गया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री आवास योजना के 500 से अधिक लाभार्थियों ने अपने घरों के पास सोख्ता गड्ढे बनाकर जल पुनर्भरण उपायों को अपनाया है।
ग्राम सभाओं के प्रस्तावों और जिला प्रशासन के तकनीकी मार्गदर्शन से इस पहल को गति मिली। माइक्रो-वाटरशेड मैपिंग और हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययन के माध्यम से ऐसे स्थानों की पहचान की गई जहां जल संचयन संरचनाएं सबसे प्रभावी हो सकती हैं।
जल स्तर और आजीविका पर प्रभाव
इस पहल के परिणामस्वरूप जिले के कई गांवों में जल उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। कुछ क्षेत्रों में भूजल स्तर लगभग तीन से चार मीटर तक बढ़ गया है। साथ ही 17 दूरस्थ आदिवासी बस्तियों में प्राकृतिक जल स्रोत फिर से सक्रिय हो गए हैं।
मिट्टी की नमी बढ़ने से कृषि उत्पादन में भी सुधार हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका मजबूत हुई है। अधिकारियों के अनुसार बेहतर जल प्रबंधन के कारण क्षेत्र से मौसमी पलायन में लगभग 25 प्रतिशत की कमी भी दर्ज की गई है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ‘जल संचय जन भागीदारी’ छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में चलाया जा रहा सामुदायिक जल संरक्षण कार्यक्रम है।
- इस पहल में किसानों को अपनी कृषि भूमि का लगभग पाँच प्रतिशत हिस्सा भूजल पुनर्भरण के लिए देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
- ‘नीर नायिका’ समुदाय स्तर पर जल संरक्षण को बढ़ावा देने वाली महिला स्वयंसेवक होती हैं।
- ‘जल दूत’ युवा स्वयंसेवक होते हैं जो जल प्रबंधन से जुड़े जागरूकता अभियान और फील्ड गतिविधियों में भाग लेते हैं।
कोरिया जिले की यह पहल दर्शाती है कि वैज्ञानिक योजना और सामुदायिक सहभागिता के संयोजन से जल संकट जैसी गंभीर समस्या का टिकाऊ समाधान संभव है। यह मॉडल देश के अन्य जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।