चीन का नया जातीय एकता कानून और राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने की पहल
चीन ने राष्ट्रीय एकता और साझा पहचान को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक नया कानून पारित किया है। “जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने” नामक इस कानून को नेशनल पीपल्स कांग्रेस ने भारी बहुमत से मंजूरी दी है और यह 1 जुलाई 2026 से लागू होगा। यह कदम चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसका लक्ष्य विभिन्न जातीय समुदायों को एक साझा राष्ट्रीय ढांचे में और अधिक संगठित करना है। सरकार के अनुसार यह कानून सामाजिक स्थिरता, विकास और राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूत करेगा।
राष्ट्रीय पहचान और सामाजिक एकीकरण पर जोर
इस कानून का मुख्य उद्देश्य चीन के 56 आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त जातीय समूहों के बीच एक साझा चीनी पहचान को बढ़ावा देना है। चीन की कुल आबादी में लगभग 91 प्रतिशत लोग हान समुदाय से हैं, जबकि शेष आबादी में तिब्बती, उइगर, मंगोल, हुई और मंचू जैसे समुदाय शामिल हैं। ये अल्पसंख्यक समूह मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में रहते हैं जो प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं और चीन के लगभग आधे भूभाग को कवर करते हैं। नई नीति शिक्षा, आवास, रोजगार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पर्यटन और क्षेत्रीय विकास के माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क और सहयोग को बढ़ाने का प्रयास करती है।
शिक्षा प्रणाली में मंदारिन भाषा को प्राथमिकता
कानून का एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि विद्यालयों में शिक्षा का प्रमुख माध्यम मंदारिन भाषा होगी और सरकारी कार्यों में भी इसका उपयोग प्राथमिक रूप से किया जाएगा। सार्वजनिक स्थानों पर जहां मंदारिन और अल्पसंख्यक भाषाओं का संयुक्त प्रयोग होता है, वहां मंदारिन को प्राथमिक स्थान देने की व्यवस्था की गई है। हालांकि सरकार का कहना है कि अल्पसंख्यक भाषाओं और लिपियों की सुरक्षा जारी रहेगी, लेकिन प्रशासनिक और शैक्षिक व्यवस्था में मंदारिन को केंद्रीय स्थान दिया जाएगा।
धर्म के चीनीकरण और सामाजिक नीतियाँ
इस कानून के अंतर्गत धार्मिक संगठनों और संस्थानों को “धर्म के चीनीकरण” की नीति का पालन करना होगा। इसका उद्देश्य धार्मिक गतिविधियों को चीनी सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों के अनुरूप बनाना है। इसके अलावा कानून में जातीयता, धर्म या पारंपरिक रीति-रिवाजों के आधार पर विवाह पर प्रतिबंध लगाने को हतोत्साहित किया गया है। इस पहल का उद्देश्य विभिन्न समुदायों के बीच अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहित करना और सामाजिक समावेशन को बढ़ाना है, ताकि विभिन्न समूहों के बीच बेहतर समझ और सहयोग विकसित हो सके।
आलोचना और उठती चिंताएँ
हालांकि चीनी सरकार इस कानून को राष्ट्रीय एकता और विकास के लिए आवश्यक बता रही है, लेकिन कई विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि यह कानून अल्पसंख्यक समुदायों को धीरे-धीरे बहुसंख्यक हान संस्कृति में समाहित करने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस नीति के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदायों से केंद्रीय सरकार के प्रति अधिक राजनीतिक निष्ठा की अपेक्षा की जा सकती है। इसके विपरीत, चीनी सरकारी मीडिया का दावा है कि यह कानून अल्पसंख्यक परंपराओं की रक्षा करते हुए विकास और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- चीन में कुल 56 आधिकारिक जातीय समूह मान्यता प्राप्त हैं, जिनमें हान समुदाय सबसे बड़ा है।
- चीन की लगभग 91 प्रतिशत आबादी हान जातीय समूह से संबंधित है।
- नेशनल पीपल्स कांग्रेस चीन की सर्वोच्च विधायी संस्था है।
- तिब्बत, शिनजियांग और इनर मंगोलिया चीन के प्रमुख अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र माने जाते हैं।
समग्र रूप से देखा जाए तो चीन का यह नया कानून राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह कानून जहां एक ओर सामाजिक एकीकरण और विकास को बढ़ावा देने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर इसके प्रभावों को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस भी जारी है। आने वाले समय में यह नीति चीन के जातीय संबंधों और सामाजिक संरचना को किस प्रकार प्रभावित करती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।