चावल उत्पादन में विश्व में अव्वल बना भारत: उपलब्धि के पीछे छिपा जल संकट
वर्ष 2026 में भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बनने का गौरव हासिल किया। यह उपलब्धि न केवल किसानों की मेहनत और सरकारी खाद्य सुरक्षा योजनाओं का प्रमाण है, बल्कि वैश्विक खाद्य बाजार में भारत की बढ़ती भूमिका को भी दर्शाती है। लेकिन इस सफलता के पीछे एक गहरा पर्यावरणीय और नीतिगत संकट छिपा है — तेजी से घटता भूजल स्तर, बढ़ता किसान कर्ज, और अस्थिर कृषि सब्सिडी तंत्र।
रिकॉर्ड उत्पादन की कीमत
पिछले एक दशक में भारत में चावल की खेती में निरंतर वृद्धि हुई है। आज भारत विश्व के 40% चावल निर्यात का जिम्मेदार है, जिससे वैश्विक खाद्य कीमतों और आयात-आधारित देशों की खाद्य सुरक्षा पर उसका नियंत्रण बढ़ा है। लेकिन यह विस्तार पर्यावरणीय क्षरण की कीमत पर हुआ है। चावल एक जल-गहन फसल है, और विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में इसकी अत्यधिक खेती ने भूजल पर अत्यधिक दबाव डाला है।
गहराते बोरवेल और किसान कर्ज
पंजाब और हरियाणा में किसान बताते हैं कि जहाँ दस वर्ष पूर्व 30 फीट पर भूजल उपलब्ध था, अब यह 80 से 200 फीट तक नीचे चला गया है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और सरकारी आकलनों से भी यह तथ्य पुष्ट होता है। हर गहरे बोरवेल की खुदाई किसानों के लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है, जिससे उन्हें कर्ज लेना पड़ता है। भले ही मानसून अच्छा हो, फिर भी भूजल दोहन जारी रहता है, जिससे जल स्तर पुनः भर नहीं पाता।
सब्सिडी और एमएसपी का दुष्चक्र
भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और बिजली सब्सिडी नीतियाँ चावल की खेती को कृत्रिम रूप से लाभकारी बनाती हैं। पिछले दशक में चावल का MSP लगभग 70% बढ़ा है, और बिजली की भारी सब्सिडी से भूजल दोहन की लागत बहुत कम हो जाती है। जैसा कि विशेषज्ञ उदय चंद्रा और अविनाश किशोर बताते हैं, यह नीति भारत जैसे जल-संकटग्रस्त देश को जल-गहन फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
कृषि सुधारों की राजनीतिक चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कृषि कानूनों में सुधार का प्रयास किया गया था ताकि निजी खरीद को बढ़ावा मिल सके और फसल विविधीकरण हो सके। लेकिन यह कदम पंजाब और हरियाणा में व्यापक किसान आंदोलनों का कारण बना और सरकार को कानून वापस लेने पड़े। यह घटना दर्शाती है कि चावल की MSP आधारित खरीद प्रणाली किसानों की आजीविका और राजनीतिक स्थिरता से कितनी गहराई से जुड़ी है।
वैश्विक भूमिका, घरेलू दुविधा
भारत अपनी जनसंख्या आवश्यकताओं से कहीं अधिक चावल उत्पादन करता है, और इसका अधिकांश हिस्सा निर्यात होता है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि भारत चावल उगा सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसे इतनी मात्रा में चावल उगाना चाहिए। भारत की भूमिका चावल के वैश्विक व्यापार में इतनी बड़ी है कि इसके घरेलू निर्णय अंतरराष्ट्रीय बाजार को प्रभावित करते हैं।
क्या नीतियों में बदलाव शुरू हो रहे हैं?
हरियाणा सरकार ने किसानों को चावल छोड़कर कम जल-उपयोग वाली फसलों जैसे मोटे अनाज उगाने के लिए ₹17,500 प्रति हेक्टेयर की सब्सिडी दी है, लेकिन यह सिर्फ एक सीजन के लिए है और अपेक्षित परिणाम नहीं ला सका। कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी के अनुसार, किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर स्थानांतरित करने के लिए कम से कम पांच वर्षों की सहायता योजना आवश्यक है।
गुलाटी यह भी सुझाव देते हैं कि पंजाब द्वारा चावल पर पहले से ही ₹39,000 प्रति हेक्टेयर की सब्सिडी दी जा रही है, जिसे वैकल्पिक फसलों की ओर स्थानांतरित कर किसानों की आमदनी सुरक्षित रखते हुए जल संरक्षण किया जा सकता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक और निर्यातक देश बन गया है।
- चावल एक अत्यधिक जल-गहन फसल है, और MSP व सब्सिडी इसे और बढ़ावा देते हैं।
- पंजाब और हरियाणा के कई क्षेत्र भूजल के लिहाज से “अत्यधिक दोहित” या “संकटग्रस्त” घोषित हैं।
- एक्सप्लोरर ग्रैंड स्लैम में सेवन समिट्स और दोनों ध्रुवों तक स्की यात्रा शामिल होती है।
- भारत का MSP तंत्र किसानों की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा है।
आगे की राह
भारत की चावल में वैश्विक बढ़त उसकी कृषि क्षमता का प्रमाण है, लेकिन यह नीति और प्रकृति के बीच के संघर्ष को भी उजागर करता है। खाद्य सुरक्षा के लिए बनाई गई नीतियाँ अब जलवायु संकट को बढ़ा रही हैं। अब चुनौती यह है कि ऐसे प्रोत्साहन तंत्र बनाए जाएँ जो किसानों को जल संरक्षण के लिए प्रोत्साहित करें, ना कि भूजल के दोहन के लिए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भारत की चावल सफलता की कीमत आने वाली पीढ़ियों और पारिस्थितिकी को चुकानी पड़ सकती है।