चागोस द्वीप विवाद में मालदीव की नई दावेदारी
मालदीव ने हाल ही में चागोस द्वीप समूह पर अपना दावा दोहराते हुए यूनाइटेड किंगडम के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें द्वीपों को मॉरीशस को सौंपने की योजना है। राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे पर किसी भी निर्णय में मालदीव के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह विवाद अब और अधिक जटिल होता जा रहा है, जिसमें कई देश और वैश्विक संस्थाएं शामिल हैं।
मालदीव का ऐतिहासिक दावा
मालदीव का कहना है कि चागोस द्वीपों के साथ उसके संबंध ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक आधार पर जुड़े हुए हैं। अधिकारियों के अनुसार, इन द्वीपों से सदियों पुराने संबंध रहे हैं, जो औपनिवेशिक व्यवस्था से पहले के हैं। इसी आधार पर मालदीव का मानना है कि द्वीपों की संप्रभुता पर निर्णय लेते समय उसके दावे को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
यूके के फैसले पर कूटनीतिक आपत्ति
मालदीव ने नवंबर 2024 और जनवरी 2026 में औपचारिक रूप से अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। राष्ट्रपति मुइज्जू ने ब्रिटेन के नेतृत्व के साथ बातचीत में भी इस मुद्दे को उठाया और स्पष्ट किया कि मालदीव को नजरअंदाज कर कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। हालांकि, यूनाइटेड किंगडम का कहना है कि यह मामला केवल ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच का है।
यूके-मॉरीशस समझौते का महत्व
ब्रिटेन ने चागोस द्वीपों का नियंत्रण मॉरीशस को सौंपने पर सहमति जताई है, लेकिन डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डे का उपयोग दीर्घकालिक लीज पर बनाए रखने का प्रस्ताव रखा है। यह द्वीप समूह 19वीं सदी से ब्रिटिश नियंत्रण में रहा है, और मॉरीशस की स्वतंत्रता के बाद यह विवाद और गहरा हो गया। इस समझौते के भू-राजनीतिक महत्व के कारण वैश्विक स्तर पर इस पर ध्यान केंद्रित हुआ है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- चागोस द्वीप हिंद महासागर में स्थित हैं और इनमें डिएगो गार्सिया प्रमुख सैन्य अड्डा है।
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने 2019 में चागोस को मॉरीशस से अलग करने को अवैध बताया था।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मॉरीशस के दावे का समर्थन किया है।
- यह विवाद रणनीतिक, कानूनी और भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
कानूनी और भू-राजनीतिक चुनौतियां
मालदीव इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाने की संभावना पर विचार कर रहा है, जिससे यह विवाद और जटिल हो सकता है। इसमें औपनिवेशिक इतिहास, अंतरराष्ट्रीय कानून और रणनीतिक हितों जैसे कई पहलू शामिल हैं। साथ ही, प्रमुख वैश्विक शक्तियों की मौजूदगी इसे और संवेदनशील बनाती है।
अंततः, चागोस द्वीप विवाद केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा और कानूनी ढांचे से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसका समाधान अभी भी अनिश्चित बना हुआ है।