गोवा में केलबाई देवी का पेत उत्सव: परंपरा और आस्था का संगम

गोवा में केलबाई देवी का पेत उत्सव: परंपरा और आस्था का संगम

गोवा के बिचोलिम क्षेत्र के मुलगांव में केलबाई देवी का पारंपरिक “पेत” उत्सव पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष पर्व की शुरुआत 23 मार्च की मध्यरात्रि से हुई, जो स्थानीय लोगों की गहरी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। यह उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपराओं और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।

देवी की पवित्र यात्रा का महत्व

इस उत्सव की सबसे खास विशेषता देवी केलबाई की वार्षिक यात्रा है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। परंपरा के अनुसार, देवी की प्रतिमा को एक सुसज्जित लकड़ी के ढांचे, जिसे “पेत” कहा जाता है, में स्थापित कर मुलगांव से मये गांव तक ले जाया जाता है। यह यात्रा देवी के अपनी बहन से मिलने का प्रतीक है, जो माया केलबाई पंचायतन देवस्थान से जुड़ी मानी जाती हैं। यह मिलन चैत्र शुद्ध पंचमी के शुभ अवसर पर होता है और स्थानीय समुदाय के लिए अत्यधिक धार्मिक महत्व रखता है।

श्रद्धालुओं की भागीदारी और विशेष परंपराएं

इस उत्सव में सैकड़ों श्रद्धालु भाग लेते हैं, जिनमें विशेष रूप से धोंड और चौगुले समुदाय के लोग शामिल होते हैं। “पेत” को एक विशेष व्यक्ति, जिसे “मोडे” कहा जाता है, अपने सिर पर उठाकर ले जाता है। यह व्यक्ति पूरे मार्ग के दौरान आध्यात्मिक अवस्था या ट्रांस में रहता है। श्रद्धालु नारियल पर अबोली फूल चढ़ाकर देवी की पूजा करते हैं और “कौल” नामक पारंपरिक विधि के माध्यम से देवी से मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। यह प्रक्रिया देवी के आशीर्वाद का प्रतीक मानी जाती है।

पारंपरिक मार्ग और प्रतीकात्मक घटनाएं

देवी की यात्रा एक निश्चित वन मार्ग से होकर गुजरती है, जिसमें वलशीम, बोर्डेम, भैलिपेठ, सोनार पेठ और पाजवाडा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इस दौरान कई प्रतीकात्मक घटनाएं भी होती हैं। उदाहरण के लिए, पेत को लेकर चल रहा मोडे कभी-कभी श्री शांतादुर्गा मंदिर की ओर बढ़ने का प्रयास करता है, जिसे अन्य श्रद्धालु पारंपरिक नियमों के अनुसार रोकते हैं। यह पूरी प्रक्रिया धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • केलबाई देवी गोवा की एक स्थानीय लोकदेवी हैं, जिनकी पूजा विशेष रूप से बिचोलिम क्षेत्र में की जाती है।
  • चैत्र शुद्ध पंचमी हिंदू पंचांग की एक महत्वपूर्ण तिथि है, जो वसंत ऋतु में आती है।
  • “कौल” एक पारंपरिक धार्मिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से देवी-देवताओं से संकेत या मार्गदर्शन प्राप्त किया जाता है।
  • “पेत” एक लकड़ी का विशेष ढांचा होता है, जिसका उपयोग धार्मिक जुलूसों में देवी-देवताओं की प्रतिमा को ले जाने के लिए किया जाता है।

मये गांव में तीन दिन के प्रवास के बाद देवी केलबाई उसी मार्ग से पुनः मुलगांव लौटती हैं। उनकी वापसी के साथ “मल्याची जात्रा” नामक एक अन्य महत्वपूर्ण उत्सव की शुरुआत होती है। यह संपूर्ण आयोजन गोवा की समृद्ध लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामुदायिक सहभागिता की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है, जो आज भी परंपराओं को जीवित रखे हुए है।

Originally written on March 23, 2026 and last modified on March 23, 2026.

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