गुवाहाटी के पास गरभंगा रिज़र्व फॉरेस्ट में मिली नई कांटेदार चींटी की प्रजाति: शहरी जंगलों की छिपी जैव विविधता का प्रमाण

गुवाहाटी के पास गरभंगा रिज़र्व फॉरेस्ट में मिली नई कांटेदार चींटी की प्रजाति: शहरी जंगलों की छिपी जैव विविधता का प्रमाण

गुवाहाटी के बाहरी क्षेत्र में स्थित गरभंगा रिज़र्व फॉरेस्ट में वैज्ञानिकों ने कांटेदार चींटी की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम Polyrhachis garbhangaensis रखा गया है। यह खोज दर्शाती है कि तेजी से फैलते शहरी क्षेत्रों के समीपवर्ती वनखंड भी अदृश्य और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जैव विविधता को संजोए हुए हैं।

Polyrhachis garbhangaensis की खोज और वर्गीकरण

यह प्रजाति “Polyrhachis” वंश की एक अत्यंत दुर्लभ mucronata समूह की सदस्य है। इसका औपचारिक विवरण 30 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका “Asian Myrmecology” में प्रकाशित हुआ।

इस शोध का नेतृत्व बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ की शोधकर्ता अंकिता शर्मा ने किया, जो अनिंद्य सिन्हा के निर्देशन में “Animal Behaviour and Cognition” कार्यक्रम के अंतर्गत कार्यरत हैं।

दुर्लभ वर्ग और असम में चींटी की विविधता

Polyrhachis garbhangaensis भारत में पाए जाने वाले केवल तीसरे mucronata समूह की प्रजाति है, जो इसे और भी विशेष बनाती है। भारत में Polyrhachis चींटियों की 70 से अधिक ज्ञात प्रजातियाँ हैं, जिनमें से असम में अब तक 21 प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह असम को इस वंश की विविधता का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बनाता है।

शहरीकरण और संरक्षण की चेतावनी

यह नई प्रजाति 117 वर्ग किलोमीटर में फैले गरभंगा रिज़र्व फॉरेस्ट में अगस्त 2023 में हुए एक फील्ड सर्वेक्षण के दौरान पाई गई। यह वन क्षेत्र गुवाहाटी को रानी रिज़र्व फॉरेस्ट से जोड़ने वाला ग्रीन कॉरिडोर है।

शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में तेजी से फैलते शहरीकरण के कारण चींटी और मकड़ी समुदायों पर पड़ रहे प्रभावों का अध्ययन करते हुए यह खोज की। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि तथाकथित “क्षीण” या “प्रभावित” वन भी दुर्लभ और नई प्रजातियों का आश्रय बन सकते हैं, जिससे इनके संरक्षण की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • गरभंगा रिज़र्व फॉरेस्ट, गुवाहाटी के पास स्थित है और एक ग्रीन कॉरिडोर का कार्य करता है।
  • Polyrhachis वंश की चींटियाँ एशिया में पाई जाने वाली कांटेदार चींटियाँ हैं।
  • शहरी सीमावर्ती वन क्षेत्र अदृश्य जैव विविधता का संरक्षण कर सकते हैं।
  • चींटी की विविधता पारिस्थितिकीय स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक होती है।

विशिष्ट विशेषताएँ और पारिस्थितिक संबंध

लगभग 5.6 मिमी लंबी यह असमी कांटेदार चींटी अपनी चमकीली पीली-नारंगी रंगत के कारण अन्य प्रजातियों से अलग दिखाई देती है, जबकि आमतौर पर Polyrhachis चींटियाँ काले रंग की होती हैं। इसके शरीर पर मुड़े हुए काँटे शिकारी जीवों से रक्षा करते हैं।

इसी वन क्षेत्र में शोधकर्ताओं ने एक चींटी जैसी दिखने वाली मकड़ी (ant-mimicking spider) भी दर्ज की, जो इस बात की ओर इशारा करती है कि यहाँ पर शिकारी-शिकार की जटिल पारिस्थितिक परस्पर क्रियाएँ विद्यमान हैं।

यह खोज गुवाहाटी के शेष बचे वन क्षेत्रों की वैज्ञानिक और पारिस्थितिकीय महत्ता को उजागर करती है और यह संदेश देती है कि शहरी जैव विविधता का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है जितना कि बड़े वन क्षेत्रों का।

Originally written on February 9, 2026 and last modified on February 9, 2026.

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