गुजरात में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू: समान कानून की दिशा में बड़ा कदम
गुजरात विधानसभा ने 24 मार्च 2026 को यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पारित कर दिया, जिससे वह उत्तराखंड के बाद ऐसा कानून लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया है। इस कानून का उद्देश्य विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों को एक समान कानूनी ढांचे में लाना है, जिससे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों को एक समान तरीके से विनियमित किया जा सके।
UCC विधेयक के प्रमुख प्रावधान
इस कानून के तहत विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण आवश्यक होगा, और ऐसा न करने पर ₹10,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। तलाक केवल न्यायालय की अनुमति से ही मान्य होगा। बहुविवाह (पॉलिगैमी) पर प्रतिबंध लगाया गया है और जबरन या धोखाधड़ी से किए गए विवाह पर सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। तलाक के बाद पुनर्विवाह की अनुमति बिना किसी शर्त के दी गई है। साथ ही, कुछ समुदायों में प्रचलित ‘हलाला’ जैसी प्रथाओं को भी प्रतिबंधित किया गया है।
लिव-इन संबंधों का विनियमन
इस विधेयक की एक महत्वपूर्ण विशेषता लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता देना है। ऐसे सभी संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य होगा और इनके समाप्त होने की सूचना भी देनी होगी। इन संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना जाएगा। इसके अलावा, यदि किसी महिला को लिव-इन संबंध में छोड़ दिया जाता है, तो उसे भरण-पोषण का अधिकार मिलेगा, जिससे महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलती है।
छूट और विधायी प्रक्रिया
इस कानून को अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं किया जाएगा, ताकि उनकी पारंपरिक प्रथाओं की रक्षा की जा सके। इस विधेयक का मसौदा सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था, जिसे लगभग 20 लाख सुझाव प्राप्त हुए थे। जहां सरकार ने इसे सुधार और समानता की दिशा में कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसके संवैधानिक पहलुओं और पर्याप्त चर्चा की कमी पर सवाल उठाए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- यूनिफॉर्म सिविल कोड का उद्देश्य सभी धर्मों के लिए समान कानून लागू करना है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में UCC का उल्लेख नीति निदेशक तत्वों में किया गया है।
- उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य है।
- अनुसूचित जनजातियों को उनकी परंपराओं की रक्षा के लिए अक्सर ऐसे कानूनों से छूट दी जाती है।
व्यापक प्रभाव और बहस
यह विधेयक देशभर में व्यापक राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बन गया है। सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं को समान अधिकार मिलेंगे और समाज में न्याय एवं समानता को बढ़ावा मिलेगा। वहीं आलोचकों का कहना है कि यह कानून संवैधानिक अधिकारों से टकरा सकता है और इसके क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
इस प्रकार, गुजरात का यह कदम भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस को नई दिशा देता है और भविष्य में अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।