गणतंत्र दिवस पर पहली बार बेक्ट्रीयन ऊंटों की परेड: लद्दाख की विरासत और सामरिक क्षमता का प्रदर्शन
भारत के इतिहास में पहली बार, लद्दाख के दुर्लभ दो-कुबड़ वाले बेक्ट्रीयन ऊंटों ने गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ पर परेड में भाग लिया। “गलवान” और “नुब्रा” नामक ये ऊंट केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं थे, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की सामरिक क्षमताओं, प्राचीन विरासत और आधुनिक सीमाई रणनीति का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
लद्दाख के दुर्लभ बेक्ट्रीयन ऊंट
स्थानीय रूप से “मुंदरी ऊंट” कहलाने वाले बेक्ट्रीयन ऊंट केवल लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में पाए जाते हैं। वर्तमान में भारत में इनकी संख्या लगभग 365 ही है, जिनमें से अधिकांश नुब्रा घाटी में सीमित हैं। ये ऊंट -30 डिग्री सेल्सियस तक की कठोर ठंड, पतली हवा, तीव्र पराबैंगनी किरणों और न्यूनतम वनस्पति वाले वातावरण में भी जीवित रह सकते हैं, जहाँ सामान्य यांत्रिक परिवहन अक्सर विफल हो जाता है।
उच्च ऊंचाई पर जीवित रहने की विशेष जैविक क्षमताएं
बेक्ट्रीयन ऊंटों की दो कुबड़ वसा संचयन के भंडार होती हैं, जो उन्हें 2–3 सप्ताह तक बिना भोजन के जीवित रहने की क्षमता देती हैं। जैसे-जैसे वसा का उपयोग होता है, कुबड़ सिकुड़ने लगती हैं। ये ऊँट 14,000 से 15,000 फीट की ऊंचाई पर प्रतिदिन 10–12 किलोमीटर तक 150 किलोग्राम वजन ढो सकते हैं। शोध में पाया गया है कि वे -40°C तक की ठंड को सह सकते हैं और सर्दियों में बर्फ खाकर अपनी पानी की आवश्यकता भी पूरी कर लेते हैं।
सैन्य उपयोग और सामरिक मूल्य
बेक्ट्रीयन ऊंटों की सामरिक उपयोगिता का परीक्षण रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के तहत कार्यरत डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (DIHAR) द्वारा किया गया। लगभग 17,000 फीट की ऊंचाई पर हुए परीक्षणों में पाया गया कि ये ऊँट 170 किलोग्राम तक का भार ढो सकते हैं, और यह म्यूल व पोनी की तुलना में अधिक विश्वसनीय और कार्यक्षम साबित हुए। इनके लिए अब भोजन, चिकित्सा, प्रजनन और भार प्रबंधन हेतु मानक संचालन प्रक्रियाएँ विकसित कर ली गई हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- बेक्ट्रीयन ऊंट दो कुबड़ वाले ऊँट हैं जो शीत मरुस्थल में पाए जाते हैं।
- भारत में इनकी संख्या 400 से कम है और अधिकांश नुब्रा घाटी में हैं।
- DIHAR, DRDO के अंतर्गत उच्च ऊंचाई पर अनुसंधान करता है।
- ऊँट जैसे पशु सीमावर्ती क्षेत्रों में अत्यधिक विश्वसनीय, मौन और जाम-प्रतिरोधी साधन माने जाते हैं।
रेशम मार्ग से लेकर आधुनिक सीमा रणनीति तक
इतिहास में बेक्ट्रीयन ऊंट 6,400 किलोमीटर लंबे रेशम मार्ग (Silk Route) के प्रमुख वाहक थे, जो चीन, मंगोलिया, मध्य एशिया और भारत के बीच रेशम, चाय, मसाले और धातुओं का आदान-प्रदान करते थे।
गणतंत्र दिवस पर इन ऊंटों की उपस्थिति केवल एक परंपरा की याद नहीं थी, बल्कि यह संदेश भी था कि भारत आज भी अपने प्राचीन संसाधनों को आधुनिक सैन्य रणनीति के साथ जोड़कर सीमाओं की रक्षा कर रहा है।
बेक्ट्रीयन ऊँट, आज भी, भारत की सीमा सुरक्षा रणनीति में एक मौन लेकिन शक्तिशाली भूमिका निभा रहे हैं—जहाँ मशीनें असफल होती हैं, वहाँ ये जीवित संसाधन भारत की शक्ति का प्रतीक बनकर उभरते हैं।